








धाकड़ धुरंधर धामी जी! कहां है आपका ‘न भय, न भ्रष्टाचार’?
डीएम के औचक निरीक्षण ने खोली सरकारी स्कूल की पोल, 334 में सिर्फ 204 बच्चे मिले; शिक्षक डेढ़ साल से स्कूल से गायब!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो!
हरिद्वार। सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा, मजबूत व्यवस्था और जवाबदेही के दावों के बीच हरिद्वार में जिलाधिकारी के औचक निरीक्षण ने जमीनी हकीकत की तस्वीर सामने रख दी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ‘न भय, न भ्रष्टाचार’ के नारे के बीच राजकीय प्राथमिक विद्यालय संख्या-3 ज्वालापुर में एक शिक्षक के लंबे समय से विद्यालय से अनुपस्थित रहने का मामला सामने आया। वहीं 334 बच्चों के पंजीकरण के बावजूद औचक निरीक्षण के दौरान महज 204 बच्चे ही विद्यालय में मौजूद मिले। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब एक शिक्षक चार फरवरी 2025 से विद्यालय नहीं पहुंच रहा था तो विभागीय निगरानी तंत्र आखिर कहां था और बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी।
जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने बुधवार को राजकीय प्राथमिक विद्यालय संख्या-3 ज्वालापुर और राजकीय प्राथमिक विद्यालय संख्या-18 कनखल का औचक निरीक्षण किया। डीएम के अचानक विद्यालय पहुंचने पर उन्होंने सीधे कक्षाओं में जाकर बच्चों से बातचीत की और पढ़ाई तथा पाठ्यक्रम से जुड़े सवाल पूछे। उन्होंने बच्चों से मिड-डे मील की गुणवत्ता और भोजन मिलने की नियमितता के बारे में भी जानकारी ली। इसके साथ ही विद्यालय परिसर, कक्षाओं, शौचालय, पेयजल व्यवस्था और साफ-सफाई का जायजा लिया।
ज्वालापुर के राजकीय प्राथमिक विद्यालय संख्या-3 में कुल 334 छात्र-छात्राएं पंजीकृत हैं, लेकिन निरीक्षण के दौरान केवल 204 बच्चे ही उपस्थित मिले। यानी पंजीकृत बच्चों में से करीब 130 बच्चे विद्यालय में मौजूद नहीं थे। बड़ी संख्या में बच्चों की अनुपस्थिति ने स्कूलों में नियमित उपस्थिति और अभिभावकों के साथ विद्यालय के समन्वय को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। डीएम ने बच्चों की नियमित उपस्थिति और उनकी पढ़ाई पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए तथा शिक्षकों से अभिभावकों के साथ समय-समय पर बैठक करने को कहा।
विद्यालय में 12 शिक्षक कार्यरत बताए गए हैं। प्रधानाध्यापक सरिता रानी चौधरी ने जिलाधिकारी को बताया कि शिक्षक प्रमुद अहमद चार फरवरी 2025 से विद्यालय से अनुपस्थित चल रहे हैं। शिक्षक के इतने लंबे समय से विद्यालय में नहीं पहुंचने की जानकारी सामने आने के बाद विभागीय निगरानी और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर डेढ़ साल से अधिक समय तक एक शिक्षक के विद्यालय से अनुपस्थित रहने के बावजूद व्यवस्था की निगरानी करने वाले अधिकारियों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? क्या विद्यालयों में शिक्षकों की नियमित उपस्थिति की जांच केवल कागजों तक सीमित है? इन सवालों का जवाब अब विभाग को देना होगा।
औचक निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने मिड-डे मील की गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दिया। उन्होंने बच्चों से भोजन को लेकर सीधे जानकारी ली और निर्धारित मानकों के अनुरूप स्वच्छ एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। उन्होंने भोजन में हरी सब्जी शामिल करने को भी कहा। विद्यालय परिसर, कक्षाओं, शौचालय और पेयजल स्थलों की नियमित सफाई सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए।
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी का बच्चों के बीच सहज अंदाज भी देखने को मिला। उन्होंने कक्षा में पहुंचकर बच्चों से पढ़ाई को लेकर सवाल-जवाब किए और उनकी बात सुनी। बच्चों को मन लगाकर पढ़ने तथा अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया। डीएम ने कहा कि निरीक्षण के दौरान सामने आने वाली कमियों को प्राथमिकता के आधार पर दूर कराया जाएगा। पुराने विद्यालय भवनों की मरम्मत और रखरखाव के लिए सीएसआर के माध्यम से कार्ययोजना तैयार करने की बात भी कही गई।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार एक ओर सरकारी विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर एक शिक्षक का लंबे समय तक विद्यालय से अनुपस्थित रहना और सैकड़ों बच्चों के पंजीकरण के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चों का स्कूल से गैरहाजिर मिलना व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मुख्यमंत्री धामी के ‘न भय, न भ्रष्टाचार’ के नारे के बीच अब निगाह इस बात पर है कि औचक निरीक्षण में सामने आई इस हकीकत के बाद जिम्मेदारी तय होती है या मामला महज निर्देशों और कागजी कार्रवाई तक सिमटकर रह जाता है। आखिर सरकारी स्कूल प्रदेश के भविष्य की पहली पाठशाला हैं। यहां शिक्षक की अनुपस्थिति हो या बच्चों की गैरहाजिरी, दोनों ही स्थितियां उस व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करती हैं, जिसके बेहतर होने के दावे लगातार किए जा रहे हैं।
धाकड़ धुरंधर धामी जी, दावों और धरातल के बीच की यह दूरी आखिर कब मिटेगी?
