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मुख्यमंत्री जी! स्ट्रेचर के इंतजार में दम तोड़ती जिंदगी… क्या यही है पहाड़ की बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था?
रानीखेत में घायल बुजुर्ग अस्पताल की चौखट पर तड़पता रहा, करीब पौने घंटे तक नहीं मिला स्ट्रेचर, मौत ने सरकारी दावों की खोल दी पोल।

दर्पण न्यूज 24/7 रानीखेत।

मुख्यमंत्री जी, पहाड़ की जनता आपसे बड़े-बड़े अस्पताल नहीं मांग रही, वह तो बस इतना चाहती है कि जब जिंदगी और मौत के बीच सांसें अटक रही हों, तब अस्पताल की चौखट पर उसे एक स्ट्रेचर और समय पर इलाज मिल जाए। लेकिन रानीखेत की घटना ने इस बुनियादी उम्मीद को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
65 वर्षीय पूरन सिंह अधिकारी सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए। परिजन उम्मीद लेकर उन्हें जीएसएम राजकीय चिकित्सालय पहुंचे कि अब इलाज मिलेगा और शायद जिंदगी बच जाएगी। लेकिन आरोप है कि अस्पताल परिसर में पहुंचने के बाद भी उन्हें तत्काल उपचार नहीं मिल सका। परिजनों और ग्रामीणों के मुताबिक घायल बुजुर्ग करीब पौने घंटे तक स्ट्रेचर के लिए भटकते रहे। इमरजेंसी तक पहुंचाने के लिए मदद की गुहार लगती रही, लेकिन व्यवस्था जैसे कहीं सोई पड़ी थी।
और फिर वही हुआ, जिसका डर हर परिजन को सताता है—अस्पताल की चौखट पर ही बुजुर्ग ने दम तोड़ दिया।
मुख्यमंत्री जी, यह सिर्फ पूरन सिंह अधिकारी की मौत नहीं है। यह उस भरोसे की मौत है, जिसके सहारे पहाड़ का आम आदमी सरकारी अस्पताल पहुंचता है। यह सवाल उस व्यवस्था से है, जो विज्ञापनों और सरकारी बयानों में अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से लैस नजर आती है, लेकिन जमीन पर एक घायल को अस्पताल के दरवाजे से इमरजेंसी तक पहुंचाने के लिए भी तत्काल व्यवस्था नहीं कर पाती।
सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे लगातार किए जाते हैं। लेकिन दावा तब बेमानी हो जाता है, जब एक घायल इंसान अस्पताल पहुंचकर भी मदद के लिए तड़पता रहे।
अस्पताल के चिकित्साधिकारी का पक्ष है कि उन्हें मरीज की स्थिति की गंभीरता की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी और मरीज को इमरजेंसी वार्ड में लाने के लिए कहा गया। यह पक्ष अपनी जगह है, लेकिन इसके बाद भी कई सवाल अनुत्तरित हैं—गंभीर हालत में पहुंचे मरीज को तत्काल ट्रायेज क्यों नहीं मिला? स्ट्रेचर क्यों उपलब्ध नहीं था? स्वास्थ्यकर्मी वाहन तक क्यों नहीं पहुंचे? आपातकालीन स्थिति में जिम्मेदारी तय करने वाला प्रोटोकॉल कहां था?
इन सवालों का जवाब सिर्फ रानीखेत के लोगों को नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश को चाहिए।
मुख्यमंत्री जी, पहाड़ में अस्पताल तक पहुंचना ही किसी परिवार के लिए संघर्ष से कम नहीं होता। कई किलोमीटर की दूरी, खराब सड़कें और सीमित संसाधनों के बावजूद जब कोई परिवार अपने घायल को लेकर अस्पताल पहुंचता है तो उसकी आखिरी उम्मीद डॉक्टर और अस्पताल की व्यवस्था ही होती है। अगर वहां भी उसे स्ट्रेचर के लिए भटकना पड़े, तो फिर वह परिवार किस दरवाजे पर दस्तक दे?
रानीखेत की घटना को एक सामान्य हादसा मानकर भुला देना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। इसकी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। यह भी तय होना चाहिए कि घटना के दौरान अस्पताल में कौन-कौन से संसाधन उपलब्ध थे, ड्यूटी पर कौन था, आपातकालीन प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं और यदि कहीं लापरवाही हुई तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है।
क्योंकि सवाल एक पूरन सिंह अधिकारी का नहीं है।
सवाल यह है कि कल अगर इसी अस्पताल की चौखट पर कोई दूसरा घायल जिंदगी की आखिरी उम्मीद लेकर पहुंचे तो क्या उसे भी स्ट्रेचर मिलने का इंतजार करना पड़ेगा?
मुख्यमंत्री जी, सरकारी योजनाओं की फाइलों में स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी भी बेहतर क्यों न दिखाई दे, उसकी असली तस्वीर अस्पताल की इमरजेंसी में सामने आती है। रानीखेत की यह घटना उसी तस्वीर को आपके सामने रख रही है।
इसे सिर्फ एक मौत की खबर समझकर आगे मत बढ़ जाइए।
इसे पहाड़ की उस पुकार की तरह सुनिए, जो पूछ रही है—
“मुख्यमंत्री जी, जब जिंदगी अस्पताल पहुंचकर भी स्ट्रेचर के इंतजार में हार जाए, तो बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था का दावा आखिर किसके लिए है?”