








कागजों में इलाज, जमीन पर रेफरल! हाईकोर्ट की सख्ती ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की परतें!
एसटीएच की पूर्व जांच रिपोर्ट से असंतुष्ट हाईकोर्ट ने दिए दोबारा जांच के आदेश!
नैनीताल अस्पताल में आईसीयू के दावे के बावजूद ईसीजी के लिए हल्द्वानी रेफर किए जाने पर अदालत सख्त!
डॉक्टरों के तबादले और रिक्त पदों पर भी उठे सवाल—सरकार से मांगा जमीनी हिसाब!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो
नैनीताल। उत्तराखंड में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकारी दावों और मरीजों के अनुभव के बीच बढ़ता फासला अब हाईकोर्ट के सवालों के घेरे में है। अस्पतालों में सुविधाएं उपलब्ध होने के सरकारी आंकड़ों के बावजूद मरीजों को जरूरी जांच और विशेषज्ञ उपचार के लिए दूसरे अस्पतालों की दौड़ लगानी पड़ रही है। यही तस्वीर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट पर हुई सुनवाई के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट के सामने भी आई।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पूर्व की जांच और कार्रवाई की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत सुशीला तिवारी राजकीय मेडिकल कॉलेज की पूर्व जांच रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुई और वहां दोबारा जांच कराने के आदेश दिए।
रिपोर्ट कहती है सुविधा है, मरीज कहता है रेफर कर दिया!
सुनवाई के दौरान जिला अस्पताल नैनीताल की व्यवस्था का उदाहरण सामने आया। कोर्ट के समक्ष बताया गया कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार अस्पताल में आईसीयू की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन मरीज को एक ईसीजी तक के लिए हल्द्वानी रेफर किया जा रहा है।
यही वह बिंदु है जहां सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा शुरू होती है।
अस्पताल में सुविधा दर्ज होना और जरूरत के समय मरीज को वह सुविधा मिलना—दोनों एक बात नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने इसी अंतर को गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य सचिव को स्वयं जिला अस्पताल नैनीताल का निरीक्षण करने और दो सप्ताह के भीतर सुधारात्मक कार्रवाई की रिपोर्ट शपथपत्र के माध्यम से पेश करने के निर्देश दिए हैं।
एसटीएच की रिपोर्ट पर दोबारा जांच क्यों?
सुशीला तिवारी राजकीय मेडिकल कॉलेज की पूर्व जांच रिपोर्ट से अदालत का असंतुष्ट होना भी व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण सवाल है। यदि जांच के दौरान सामने आई कमियां बाद में भी बनी रहती हैं तो सवाल केवल कमियों का नहीं, बल्कि उनकी निगरानी और सुधार की प्रक्रिया का भी है।
अदालत ने दोबारा जांच के आदेश देकर यह स्पष्ट किया कि सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था का मूल्यांकन केवल रिपोर्टों के आधार पर पूरा नहीं माना जा सकता।
विशेषज्ञ डॉक्टर गए, विकल्प कब आएंगे?
सुनवाई में न्यायमित्र ने अदालत को बताया कि सुशीला तिवारी राजकीय मेडिकल कॉलेज से 16 वरिष्ठ चिकित्सकों तथा बीडी पांडे अस्पताल से कई विशेषज्ञ डॉक्टरों का स्थानांतरण किया गया, लेकिन उनके स्थान पर नई नियुक्तियां नहीं हुईं।
हाईकोर्ट ने स्थानांतरण नीति पर पुनर्विचार करने और रिक्त पदों पर तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति के निर्देश दिए हैं। सरकार की ओर से जल्द नियुक्तियां करने का आश्वासन दिया गया है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब विशेषज्ञ चिकित्सक का पद खाली होता है तो उसका असर कागज पर दर्ज होता है या मरीज के इलाज पर?
सिर्फ डॉक्टर नहीं, पूरी व्यवस्था की जरूरत!
स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अस्पताल की इमारत या डॉक्टरों की संख्या से नहीं बनती। मरीज को समय पर जांच, विशेषज्ञ परामर्श, जरूरी उपकरण, दवाएं, प्रशिक्षित स्टाफ और आवश्यकता पड़ने पर उच्च स्तरीय उपचार—इन सभी की जरूरत होती है।
इनमें से किसी एक कड़ी के कमजोर पड़ने का सीधा असर मरीज पर पड़ता है।
इसीलिए हाईकोर्ट के सवालों को केवल किसी एक अस्पताल की व्यवस्था तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं होगा। ये सवाल प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में योजना, क्रियान्वयन, निगरानी और जवाबदेही की पूरी श्रृंखला से जुड़े हैं।
सेनेटोरियम अस्पताल पर भी मांगी रिपोर्ट
अदालत ने नैनीताल के सेनेटोरियम अस्पताल को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाए जाने के संबंध में भी अगली सुनवाई तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
अब देखना होगा कि सरकारी घोषणाओं और प्रस्तावों का धरातल पर कितना असर दिखाई देता है।
जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल—सरकारी सुविधा आखिर कितनी सुलभ?
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच केवल आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। किसी दूरस्थ क्षेत्र का मरीज जब इलाज के लिए निकलता है तो उसके लिए अस्पताल तक पहुंचना ही बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में यदि वहां पहुंचने के बाद भी आवश्यक जांच या विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध न हो और उसे दूसरे शहर भेज दिया जाए, तो स्वास्थ्य सुविधा की पहुंच का दावा सवालों के घेरे में आना स्वाभाविक है।
दर्पण न्यूज 24/7 का सवाल यही है—
क्या उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता सरकारी फाइलों में दर्ज सुविधाओं से तय होगी या उस मरीज से, जिसे बीमारी की घड़ी में वास्तव में समय पर इलाज मिला?
हाईकोर्ट ने रिपोर्टों से आगे बढ़कर जमीनी स्थिति देखने की जरूरत पर जोर दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि निरीक्षण, दोबारा जांच और सरकार के शपथपत्र के बाद व्यवस्था में कितना वास्तविक बदलाव आता है।
क्योंकि अस्पताल की दीवार पर लगी सुविधाओं की सूची से ज्यादा महत्वपूर्ण है—बीमारी की घड़ी में मरीज को मिलने वाली सुविधा।
कागज क्या कहता है, यह सरकार बताएगी,
जमीन पर क्या है, इसका जवाब अब व्यवस्था को देना होगा।
