

18 सितंबर के आदेश ने बढ़ाया जिम्मेदारी का सवाल!
अब मलबे की हर निकासी का हिसाब जरूरी, तो पहले निकली सामग्री की निगरानी और रिकॉर्ड की जिम्मेदारी किसकी थी?
लालकुआं। हल्दूचौड़ स्थित उत्तराखंड राज्य सहकारी संघ (यूसीएफ) के सोयाबीन एवं वनस्पति कॉम्प्लेक्स में ध्वस्तीकरण से निकलने वाले मलबे और स्क्रैप की निकासी को लेकर 18 सितंबर को जारी आदेश ने नई व्यवस्था के साथ जिम्मेदारी और पुराने रिकॉर्ड का सवाल भी खड़ा कर दिया है। आदेश में ध्वस्तीकरण से निकलने वाली हर सामग्री की मात्रा, वाहन और चालक का विवरण दर्ज करने तथा दो जिम्मेदार कर्मचारियों के संयुक्त हस्ताक्षर के बाद ही उसे परिसर से बाहर ले जाने की व्यवस्था लागू की गई है।
परियोजना प्रबंधक की ओर से जारी पत्रांक सोया/वन/स्था०/2026-27/504 में कहा गया है कि ध्वस्तीकरण से प्राप्त मलबा, लोहा, ईंट, लकड़ी और अन्य उपयोगी अथवा स्क्रैप सामग्री को सुव्यवस्थित, पारदर्शी और अभिलेखीय तरीके से बाहर ले जाने के लिए यह व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू की जा रही है।
आदेश के अनुसार अवर अभियंता और हरीश चंद्र कांडपाल के संयुक्त हस्ताक्षर के बिना कोई सामग्री ध्वस्तीकरण स्थल से बाहर नहीं ले जाई जाएगी। सामग्री बाहर ले जाने से पहले उसका प्रकार, मात्रा अथवा संख्या, वाहन नंबर, तारीख और समय निर्धारित रजिस्टर में दर्ज करना होगा। इसके बाद दोनों जिम्मेदार कर्मचारियों के संयुक्त हस्ताक्षर से विवरण की पुष्टि होगी और तभी सामग्री बाहर ले जाने की अनुमति दी जाएगी।
आदेश में मुख्य गेट पर तैनात कर्मचारी की भूमिका भी स्पष्ट की गई है। प्रत्येक वाहन के आवागमन का रिकॉर्ड रखा जाएगा। वाहन नंबर, चालक का नाम, सामग्री का विवरण, मात्रा, निर्गमन का समय और संबंधित संयुक्त हस्ताक्षर का मिलान किया जाएगा। संयुक्त हस्ताक्षर के बिना सामग्री लेकर किसी वाहन को बाहर नहीं जाने देने के निर्देश हैं।
यदि कोई वाहन निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत या बिना अभिलेखीय प्रविष्टि के सामग्री ले जाने का प्रयास करता है तो उसे बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और तत्काल उच्चाधिकारी को सूचना देनी होगी। आदेश में सामग्री निर्गमन से संबंधित रजिस्टर और अन्य अभिलेख सुरक्षित रखने के निर्देश भी हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर उनका सत्यापन, निरीक्षण और लेखा परीक्षण किया जा सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश में अवर अभियंता के अलावा हरीश चंद्र कांडपाल और मुख्य गेट पर तैनात कर्मचारी को इस व्यवस्था के कड़ाई से अनुपालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
18 सितंबर के आदेश की यही व्यवस्था अब ध्वस्तीकरण की शुरुआती अवधि को लेकर सवाल खड़े कर रही है। जब 18 सितंबर से सामग्री की निकासी के लिए प्रकार, मात्रा, वाहन, चालक, समय और संयुक्त हस्ताक्षर तक अनिवार्य कर दिए गए हैं, तो सवाल यह है कि 18 सितंबर से पहले परिसर से बाहर गई सामग्री की निगरानी और उसका रिकॉर्ड किस व्यवस्था के तहत रखा गया था?
ध्वस्तीकरण शुरू होने से 18 सितंबर तक कितनी सामग्री बाहर गई? कितने वाहन परिसर से निकले? किस वाहन में कितनी सामग्री गई? उसकी मात्रा किसने दर्ज की? गेट पर किस स्तर पर सत्यापन हुआ? और उस सामग्री के निस्तारण का रिकॉर्ड कहां है? इन सवालों का जवाब पुराने अभिलेखों के परीक्षण से ही सामने आ सकता है।
आरबीएम की खुदाई और विद्युत पोलों को स्क्रैप में दिए जाने की शिकायतें पहले ही सामने आ चुकी हैं। इन शिकायतों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन 18 सितंबर के आदेश ने सामग्री निकासी की जवाबदेही के लिए जो स्पष्ट प्रक्रिया तय की है, उसने नई व्यवस्था से पहले की निकासी के रिकॉर्ड की अहमियत बढ़ा दी है।
विद्युत पोलों से संबंधित शिकायत में पोलों की संख्या, उन्हें हटाने की अनुमति, स्क्रैप निस्तारण, खरीदार और संबंधित वाहनों के रिकॉर्ड का मिलान किया जा सकता है। वहीं आरबीएम के मामले में मौके पर हुई खुदाई, निकली सामग्री और उसके निस्तारण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण होगी।
18 सितंबर का आदेश केवल गेट पर रजिस्टर रखने का निर्देश नहीं है। इसमें सामग्री की पहचान से लेकर उसकी मात्रा, वाहन, चालक, समय, संयुक्त सत्यापन और गेट पर अंतिम मिलान तक पूरी प्रक्रिया तय की गई है। इससे आगे होने वाली प्रत्येक निकासी का दस्तावेजी रिकॉर्ड तैयार होगा।
लेकिन यही व्यवस्था पीछे मुड़कर देखने का आधार भी बनाती है। 18 सितंबर के बाद हर निकासी का हिसाब दर्ज होगा, तो उससे पहले हुई निकासी का हिसाब भी पुराने रिकॉर्ड से तलाशना होगा। यही वह बिंदु है जहां आदेश सामग्री की निगरानी से आगे बढ़कर जिम्मेदारी के सवाल को सामने लाता है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उपलब्ध पुराने गेट रजिस्टर, वाहन विवरण, स्क्रैप निस्तारण के दस्तावेज और अन्य अभिलेख 18 सितंबर से पहले की निकासी की तस्वीर कितनी स्पष्ट करते हैं। क्योंकि नई व्यवस्था ने आगे की जिम्मेदारी तय कर दी है, लेकिन पहले हुई निकासी की जवाबदेही किस रिकॉर्ड और किस व्यवस्था के आधार पर तय होगी—यही बड़ा सवाल है।
