

ड्रग्स फ्री देवभूमि… एक तरफ जागरूकता, दूसरी तरफ नशे से कमाई!
डेढ़ लाख विद्यार्थियों को नशे के खिलाफ संदेश, वहीं शराब कारोबार से हजारों करोड़ का राजस्व—देवभूमि में नशे के खिलाफ लड़ाई का विरोधाभास!
देहरादून। एक तरफ ‘ड्रग्स फ्री देवभूमि’ का संकल्प, दूसरी तरफ शराब कारोबार से हजारों करोड़ का राजस्व। उत्तराखंड में नशे के खिलाफ सरकारी अभियान और शराब की बढ़ती उपलब्धता के बीच यह विरोधाभास अब सवाल खड़े कर रहा है।
एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (एएनटीएफ) ने शनिवार को प्रदेशभर के करीब 1.50 लाख विद्यार्थियों को ऑनलाइन जोड़कर नशे के खिलाफ जागरूक किया। विद्यार्थियों को स्मैक, चरस, गांजा,शराब और सिंथेटिक ड्रग्स के खतरों से आगाह किया गया। अधिकारियों ने गलत संगति से बचने और नशे से दूर रहने की अपील की।
जरूरत इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देहरादून और मैदानी क्षेत्रों में ड्रग्स तस्करी के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। पुलिस और एसटीएफ की कार्रवाइयों में युवाओं और छात्रों के ड्रग नेटवर्क से जुड़ने के मामले भी सामने आए हैं। कैंपस, हॉस्टल और पीजी के आसपास सक्रिय नेटवर्क सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना हुआ है।
लेकिन इसी बीच तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने है।
राज्य में शराब कारोबार आबकारी राजस्व का बड़ा स्रोत है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक शराब से मिलने वाला राजस्व हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और प्रदेश में सैकड़ों फुटकर शराब दुकानें संचालित हैं। नए क्षेत्रों में दुकानों के आवंटन और शराब की आसान उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है—जब सरकार डेढ़ लाख बच्चों को नशे से बचने का पाठ पढ़ा रही है, तो क्या शराब की उपलब्धता और उससे जुड़े सामाजिक प्रभावों पर भी उतनी ही गंभीरता से नीति बनेगी?
ड्रग्स अवैध है और उसके खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। शराब कानूनी कारोबार है और उससे मिलने वाला राजस्व सरकारी खजाने में जाता है। दोनों को कानूनी रूप से एक तराजू में तौलना उचित नहीं होगा। लेकिन युवाओं को नशे से बचाने की चुनौती के बीच नशे की उपलब्धता, सामाजिक असर और सरकारी राजस्व—इन तीनों के बीच संतुलन पर बहस जरूर जरूरी है।
जागरूकता अभियान अपनी जगह अहम हैं, लेकिन सवाल अभियान के बाद का है। क्या स्कूल-कॉलेजों के आसपास ड्रग नेटवर्क पर स्थायी रोक लगेगी? क्या युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए केवल अपील से आगे बढ़कर सामाजिक और प्रशासनिक तंत्र मजबूत होगा? और क्या शराब नीति के सामाजिक प्रभावों का भी उसी गंभीरता से आकलन होगा?
देवभूमि को नशामुक्त बनाने की लड़ाई सिर्फ ड्रग्स पकड़ने से नहीं जीती जाएगी। असली परीक्षा यह है कि सरकार जागरूकता, कार्रवाई और राजस्व नीति—तीनों के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाती है, जिसमें युवा सुरक्षित रहें और ‘ड्रग्स फ्री देवभूमि’ सिर्फ अभियान का नारा बनकर न रह जाए।
