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उपलब्धियों के दावों के बीच ज्योलिकोट की बीमारी ने पूछे सवाल!

हल्द्वानी के मंचों से सुशासन का बखान, पहाड़ में दूषित पानी से बीमारी का प्रकोप, हैट्रिक के शंखनाद के बीच कथनी और करनी की परीक्षा!

हल्द्वानी। एक तरफ हल्द्वानी के विभिन्न मंचों से सरकार सुशासन और स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती, बेहतर व्यवस्थाओं और उपलब्धियों का बखान कर रही है, दूसरी तरफ नैनीताल के ज्योलिकोट और आसपास के गांव जलजनित बीमारी की चपेट में हैं। अस्पतालों में मरीज पहुंच रहे हैं, पानी के स्रोतों और टैंकों की जांच हो रही है और बीमारी पर नियंत्रण के लिए अब 24 घंटे सचल चिकित्सा वाहन तक शुरू करना पड़ा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी दावों और पहाड़ की जमीनी हकीकत के बीच यह फासला क्यों है?

सरकार के अनुसार 18 अगस्त से प्रभावित क्षेत्रों में 1540 घरों का घर-घर सर्वे किया जा चुका है। पीएचसी ज्योलिकोट में 675 और स्वास्थ्य शिविरों में 468 मरीजों को उपचार एवं परामर्श दिया गया। 130 मरीजों को भर्ती कर उपचार उपलब्ध कराया गया। आउटब्रेक प्रबंधन के लिए 53 स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती की गई है और ज्योलिकोट अस्पताल को 24 घंटे संचालित किया जा रहा है। प्रभावित क्षेत्रों में ओआरएस और क्लोरीन की गोलियां वितरित की गई हैं।

आंकड़े सरकारी सक्रियता की तस्वीर जरूर दिखाते हैं, लेकिन यही आंकड़े एक दूसरा सवाल भी खड़ा करते हैं, जब निगरानी और स्वास्थ्य तंत्र इतना सक्रिय था तो बीमारी के फैलने से पहले दूषित पानी की पहचान क्यों नहीं हो सकी?

ज्योलिकोट के सेंट एंथोनीस कान्वेंट स्कूल के परिसर में बने पानी के टैंकों के निरीक्षण में पानी अत्यधिक गंदा पाए जाने और नमूनों में टोटल कॉलिफॉर्म पाए जाने की जानकारी सामने आई है। इन टैंकों से स्कूल परिसर के अलावा आसपास के करीब 20 परिवारों को भी पानी की आपूर्ति होने की बात कही गई है। प्रशासन ने अब दूषित पानी के उपयोग और वितरण पर रोक लगाकर सफाई, विसंक्रमण और लीकेज जांच के निर्देश दिए हैं।

यहीं से कथनी और करनी के अंतर का सवाल और गहरा हो जाता है। यदि पेयजल स्रोतों, टैंकों और जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी व्यवस्था प्रभावी थी तो दूषित पानी बीमारी का कारण बनने तक कैसे पहुंचा? और यदि निगरानी में कहीं चूक हुई तो उसकी जिम्मेदारी तय करने की पहल कब होगी?

इधर हल्द्वानी में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ 2027 की हैट्रिक का शंखनाद कर रहे हैं और सरकार की उपलब्धियां जनता के सामने रखी जा रही हैं। राजनीतिक अभियान अपनी जगह है, लेकिन इसी दौरान ज्योलिकोट का पहाड़ साफ पानी और बीमारी से सुरक्षा की मांग कर रहा है। एक तरफ उपलब्धियों के दावे, दूसरी तरफ दूषित पानी की हकीकत, इन दोनों तस्वीरों के बीच जनता किसे सरकार के काम का पैमाना माने?

सरकार की ओर से स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल द्वारा देहरादून से स्थिति की लगातार निगरानी और प्रभावित क्षेत्रों में घर-घर सर्वे, जांच, उपचार व विभागीय समन्वय के निर्देश दिए जा रहे हैं। सीडीओ ने हल्द्वानी के अस्पतालों में भर्ती मरीजों का हाल जाना है। बेस अस्पताल में प्रभावित मरीजों के लिए अलग वार्ड बनाया गया है और सचल चिकित्सा वाहन को 24 घंटे सेवा में लगाया गया है।

यह कार्रवाई जरूरी है और राहत की बात भी है। लेकिन सवाल बीमारी के बाद की सक्रियता से ज्यादा बीमारी से पहले की सतर्कता का है। बीमारी सामने आने के बाद अस्पताल, डॉक्टर, दवाइयां और मोबाइल यूनिट जुट जाना व्यवस्था की मजबूरी है, बीमारी को फैलने से पहले रोक देना व्यवस्था की सफलता होती।

ज्योलिकोट का प्रकरण इसलिए केवल स्वास्थ्य विभाग की चुनौती नहीं है। यह पेयजल व्यवस्था, जलस्रोतों की निगरानी, स्थानीय प्रशासन और सरकारी तंत्र की जवाबदेही की भी परीक्षा है। सरकार की उपलब्धियों पर सवाल उठाना उनका खंडन नहीं, बल्कि उनकी जमीनी कसौटी पूछना है।

आखिर सुशासन का पैमाना क्या है, बीमारी के बाद मरीजों का आंकड़ा, या बीमारी से पहले सुरक्षित पानी की व्यवस्था?

ज्योलिकोट फिलहाल इसी सवाल का जवाब मांग रहा है। हल्द्वानी के मंचों से उपलब्धियों का जितना भी बखान हो, पहाड़ की जमीन पर उन उपलब्धियों की असली परीक्षा साफ पानी, सुरक्षित स्वास्थ्य और समय रहते की गई कार्रवाई से ही होगी।

कथनी में मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और करनी में बीमारी के बाद सक्रियता, ज्योलिकोट ने इस अंतर पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया है।