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खेती ही नहीं, जीना भी दुश्वार! पहाड़ की पीड़ा और सरकार के दावों के बीच गहराती खाई!

डसीली में जंगली सुअरों ने दो दर्जन से अधिक किसानों की खरीफ फसल रौंदी, दिन में बंदर-लंगूर तो रात में सुअरों का आतंक; आखिर कब बदलेगी पहाड़ के किसान की तस्वीर?

दर्पण न्यूज 24/7 संवाददाता अल्मोड़ा!

पहाड़ की जिंदगी जितनी बाहर से खूबसूरत दिखाई देती है, उसकी जमीनी हकीकत उतनी ही पीड़ादायक है। यहां किसान खेत में सिर्फ अनाज नहीं उगाता, बल्कि तमाम मुश्किलों के बीच अपने परिवार की उम्मीदों को जिंदा रखता है। लेकिन जब उसी किसान की खड़ी फसल बार-बार वन्यजीवों के आतंक की भेंट चढ़ने लगे तो सवाल सिर्फ खेती का नहीं रह जाता, सवाल पहाड़ में जीने की जद्दोजहद का बन जाता है।

दन्या क्षेत्र की ग्राम पंचायत डसीली में जंगली सुअरों के झुंड ने रात के अंधेरे में खेतों में घुसकर दो दर्जन से अधिक काश्तकारों की खरीफ की फसल बर्बाद कर दी। मक्का, मडुवा, झिंगुरा और धान समेत कई फसलों को सुअरों ने खेत खोदकर नष्ट कर दिया। किसान जिस फसल को तैयार करने के लिए महीनों पसीना बहा रहा था, वह कुछ ही घंटों में खेतों में बिखरी दिखाई दी।

डसीली की बीडीसी सदस्य हर्षिता गैड़ा की सूचना पर राजस्व और वन विभाग की टीम गांव पहुंची और प्रभावित खेतों का निरीक्षण कर नुकसान का जायजा लिया। ग्रामीणों के मुताबिक दिन में बंदर और लंगूर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं और रात होते ही जंगली सुअरों के झुंड खेतों में उतर आते हैं। यानी किसान के लिए अब दिन भी चैन का नहीं और रात भी सुरक्षित नहीं।

यह सिर्फ फसल की बर्बादी नहीं है। यह उस किसान की उस उम्मीद की बर्बादी है, जो पहाड़ की कठिन परिस्थितियों में भी खेती से जुड़ा हुआ है। वह खेती छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन जब खेत में बोया हुआ बीज उसके घर पहुंचने से पहले ही वन्यजीवों का निवाला बन जाए तो आखिर वह कब तक खेती से जुड़ा रहेगा?

सामाजिक कार्यकर्ता कुंदन गैड़ा ने प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिलाने की मांग की है। वहीं राजस्व उप निरीक्षक, तहसील भनोली हितेश टम्टा के अनुसार दो दर्जन से अधिक किसान प्रभावित हुए हैं और फसल क्षति का आकलन कर रिपोर्ट भेजी जा रही है। निरीक्षण टीम में डिप्टी रेंजर भूपाल राम, वन बीट अधिकारी नारायण सिंह राणा, राजस्व उप निरीक्षक हितेश टम्टा समेत वन एवं राजस्व विभाग के कर्मचारी मौजूद रहे।

लेकिन सरकारी टीम का नुकसान का आकलन करना इस कहानी का अंत नहीं, बल्कि असली सवाल की शुरुआत है।

क्योंकि सवाल यह है कि हर साल फसल बर्बाद होने के बाद किसान को मुआवजा देकर क्या समस्या खत्म हो जाएगी? क्या किसान को ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए जिसमें उसकी फसल पहले सुरक्षित रहे? क्या उसे अपनी ही मेहनत को बचाने के लिए दिन-रात खेतों की रखवाली करने से मुक्ति नहीं मिलनी चाहिए?

सरकार पहाड़ में खेती को बढ़ावा देने, किसानों की आय बढ़ाने और पलायन रोकने के दावे करती है। योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं और रणनीतियां तैयार होती हैं। लेकिन डसीली के खेतों में पसरी तबाही इन दावों और धरातल के बीच मौजूद उस खाई को उजागर कर रही है, जो लगातार गहरी होती दिखाई दे रही है।

एक तरफ कहा जाता है कि किसान की आय बढ़ानी है, दूसरी तरफ किसान की तैयार फसल सुरक्षित नहीं। एक तरफ पहाड़ में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने की बात होती है, दूसरी तरफ वन्यजीवों का बढ़ता आतंक ग्रामीणों को खेती से विमुख कर रहा है। एक तरफ पलायन रोकने की चिंता जताई जाती है, दूसरी तरफ गांव का किसान अपने खेत में ही असुरक्षित और बेबस महसूस कर रहा है।

फिर कैसे रुकेगा पलायन?

जिस किसान के लिए खेत ही उसकी आजीविका है, अगर वही खेत उसके लिए जोखिम और नुकसान का कारण बन जाए तो अगली पीढ़ी खेती की ओर क्यों लौटेगी? यही वह सवाल है जिसे डसीली की घटना सरकार के सामने रख रही है।

पहाड़ की पीड़ा यह है कि यहां किसान सिर्फ मौसम से नहीं लड़ रहा। कभी अतिवृष्टि फसल बहा ले जाती है, कभी सूखा परेशान करता है, कभी जंगली जानवर खेत उजाड़ देते हैं और कभी बाजार उसकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं देता। इसके बावजूद पहाड़ का किसान अपनी मिट्टी से जुड़ा हुआ है। लेकिन उसकी इस जिजीविषा की भी एक सीमा है।

डसीली में जंगली सुअरों द्वारा रौंदी गई फसल उस सीमा की ओर इशारा कर रही है।

यह तस्वीर सरकार को सिर्फ मुआवजे की फाइल नहीं, बल्कि पहाड़ के भविष्य की चेतावनी के रूप में देखनी होगी। यदि खेत सुरक्षित नहीं हुए, किसान की मेहनत सुरक्षित नहीं हुई और ग्रामीण जीवन को वन्यजीव संघर्ष से राहत नहीं मिली तो योजनाओं के कागज पर भले ही पहाड़ समृद्ध दिखाई दे, लेकिन गांवों की हकीकत कुछ और ही कहानी कहेगी।

पहाड़ पूछ रहा है—किसान की आय बढ़ाने के दावे तब कैसे सच होंगे, जब उसकी फसल खेत में ही सुरक्षित नहीं? पलायन रोकने की बात तब कैसे साकार होगी, जब गांव में खेती करना ही मुश्किल होता जा रहा है?

डसीली के खेतों में रौंदी गई फसल शायद आने वाले समय की सबसे गंभीर तस्वीर है। यह सिर्फ एक किसान का नुकसान नहीं, बल्कि उस पहाड़ की पीड़ा है जो आज भी उम्मीद लगाए बैठा है कि उसके खेत बचेंगे, किसान बचेगा और गांव आबाद रहेंगे।

सरकार को अब दावों और घोषणाओं से आगे बढ़कर पहाड़ के खेतों तक पहुंचना होगा। क्योंकि यहां सवाल सिर्फ खेती बचाने का नहीं है—सवाल पहाड़ में किसान का जीवन बचाने का है।

दर्पण न्यूज 24/7

 

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