भीमताल में टिकट की जंग तेज: मुकेश बोरा ने खोला मोर्चा, तीन दशक की संगठनात्मक निष्ठा का दिया हिसाब, बोले,अब समर्पित कार्यकर्ता की बारी!
1991 से भाजपा के साथ होने का दावा, चार बार टिकट की दावेदारी के बाद भी नहीं टूटी उम्मीद, आठ हजार परिवारों से संपर्क और दुग्ध उत्पादकों के समर्थन को बनाया चुनावी ताकत, 2027 के टिकट पर पार्टी नेतृत्व के सामने रखी अपनी दावेदारी।
भीमताल। विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही भाजपा में टिकट की सियासत ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। भीमताल विधानसभा सीट पर दावेदारों की सक्रियता के बीच नैनीताल दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ के अध्यक्ष मुकेश बोरा ने भी अपनी दावेदारी को पूरी ताकत के साथ सामने रख दिया है। इस बार उनका संदेश साफ है,पार्टी के लिए तीन दशक से अधिक समय तक पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं को भी चुनावी मैदान में उतरने का मौका मिलना चाहिए।
बोरा अपनी दावेदारी को महज एक राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि 1991 से शुरू हुए संगठनात्मक सफर और वर्षों की मेहनत का परिणाम बता रहे हैं। उनका सीधा सवाल है कि जब कार्यकर्ता लगातार संगठन को मजबूत करने में जुटा रहा है, विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी के साथ खड़ा रहा है, तो आखिर उसे अवसर कब मिलेगा? हालांकि, उन्होंने मौजूदा विधायक के खिलाफ कोई सीधा मोर्चा खोलने के बजाय अपनी बात संगठन और कार्यकर्ताओं की भावनाओं के आधार पर रखी है।
चार बार टिकट की दावेदारी, हर बार इंतजार, अब पांचवीं कोशिश पर नजर!
मुकेश बोरा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नई नहीं है। वह वर्ष 2002, 2007, 2012 और 2017 में विधानसभा टिकट के लिए अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। वर्ष 2022 में भी वह प्रमुख दावेदारों में शामिल रहे। उनके मुताबिक उस समय पूर्व मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट और तत्कालीन ब्लॉक प्रमुख आसारानी के साथ उनका नाम भी पार्टी के पैनल में शामिल होकर उच्च स्तर तक पहुंचा था। इसके बावजूद पार्टी ने अंततः निर्दलीय विधायक को साथ लेकर चुनावी रणनीति बनाई।
चार बार टिकट की उम्मीद और हर बार संगठन के फैसले को स्वीकार करना अब बोरा अपनी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बता रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कभी पार्टी के फैसले के खिलाफ बगावत नहीं की, बल्कि संगठन की रीति-नीति के अनुरूप काम जारी रखा।
लेकिन अब सवाल यह है कि क्या 2027 में भी उन्हें इंतजार करना पड़ेगा या पार्टी नेतृत्व इस बार उनके संगठनात्मक अनुभव को चुनावी अवसर में बदलेगा?
मंडल अध्यक्ष से प्रदेश स्तर तक जिम्मेदारी, संगठन में लंबा सफर!
मुकेश बोरा अपनी राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा आधार संगठन में निभाई गई जिम्मेदारियों को मानते हैं। उनके मुताबिक उन्होंने मंडल महामंत्री, मंडल अध्यक्ष, जिला मंत्री, प्रदेश सह संयोजक और जिला संयोजक जैसे विभिन्न पदों पर काम किया है। वर्ष 1993 में मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने का उल्लेख करते हुए वह कहते हैं कि उनका राजनीतिक सफर केवल पद हासिल करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी को बूथ और कार्यकर्ता स्तर पर मजबूत करने में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है।
उनकी दावेदारी के पीछे एक राजनीतिक संदेश भी छिपा है,भाजपा में टिकट का पैमाना केवल मौजूदा चुनावी समीकरण नहीं, बल्कि संगठन के प्रति वर्षों की निष्ठा और जमीनी सक्रियता भी होनी चाहिए।
आठ हजार परिवारों से संपर्क, दुग्ध उत्पादकों को मान रहे सबसे बड़ी ताकत!
बोरा की दावेदारी का दूसरा मजबूत आधार उनका सहकारिता क्षेत्र से जुड़ाव है। नैनीताल दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ के अध्यक्ष के रूप में वह दुग्ध उत्पादकों के बीच अपनी सक्रियता को राजनीतिक पूंजी के तौर पर पेश कर रहे हैं।
उनका दावा है कि करीब आठ हजार परिवारों से उनका प्रतिदिन संपर्क रहता है। दुग्ध उत्पादकों और क्षेत्रीय जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने के कारण उन्हें व्यापक समर्थन मिल रहा है। प्रदेश के बड़े दुग्ध संघ में दोबारा जिम्मेदारी मिलना भी वह अपने प्रति विश्वास और समर्थन का प्रमाण मानते हैं।
हालांकि, सहकारी क्षेत्र में मजबूत पकड़ को विधानसभा चुनाव में वोटों में बदल पाना अपने आप में अलग चुनौती होगी। यही वह कसौटी होगी, जिस पर उनकी राजनीतिक दावेदारी को परखा जाएगा।
विधायक से टकराव नहीं, लेकिन कार्यकर्ता के हक की खुली पैरवी!
मौजूदा विधायक की जीत-हार और राजनीतिक ताकत पर सीधी टिप्पणी करने से बोरा ने परहेज किया है। उनका कहना है कि कौन कितने मतों से जीतने या हारने का दावा कर रहा है, इसका फैसला जनता करेगी। टिकट का निर्णय पार्टी संगठन को करना है, लेकिन भीमताल में पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की भावनाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
बोरा का मानना है कि यदि भाजपा उन्हें प्रत्याशी बनाती है तो संगठनात्मक अनुभव और जनता के बीच अपने संपर्क के आधार पर वह चुनावी मुकाबले में उतरने को तैयार हैं।
उनकी इस दावेदारी में मौजूदा विधायक को खुली चुनौती भले न हो, लेकिन पार्टी नेतृत्व के सामने कार्यकर्ता बनाम स्थापित राजनीतिक समीकरण का सवाल जरूर खड़ा होता दिखाई दे रहा है।
भाजपा के सामने असली परीक्षा: संगठन की निष्ठा या जीत का गणित?
भीमताल में 2027 की चुनावी जंग अभी दूर है, लेकिन टिकट को लेकर राजनीतिक बिसात बिछने लगी है। मुकेश बोरा की सक्रियता ने इस चर्चा को नया आयाम दिया है। एक ओर लंबे संगठनात्मक अनुभव और सहकारी क्षेत्र में सक्रियता का दावा है, तो दूसरी ओर मौजूदा विधायक की राजनीतिक स्थिति और पार्टी की चुनावी रणनीति।
भाजपा नेतृत्व के लिए चुनौती यह होगी कि वह संगठन के पुराने चेहरों की अपेक्षाओं, स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं और चुनाव जीतने की संभावनाओं के बीच संतुलन कैसे बनाता है।
मुकेश बोरा ने अपनी तरफ से दावेदारी का बिगुल बजा दिया है। चार बार टिकट की उम्मीद लगाए बैठे इस नेता की पांचवीं कोशिश कितनी सफल होगी, इसका फैसला फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि भीमताल में भाजपा की टिकट की लड़ाई अब केवल नामों की सूची तक सीमित नहीं रहने वाली।

