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हंसी के पीछे छिपा बिंदुखत्ता का दर्द: अब  उत्तराखंड के चर्चित इस हास्य कलाकार  ने धामी सरकार से कहा —‘धामी ज्यू, अब तदुक देर नि लगाओ’!

लालकुआं। पहाड़ की बोली में कही गई बात कई बार सीधे दिल में उतर जाती है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध हास्य कलाकार जीवन दानू ने भी बिंदुखत्ता की वर्षों पुरानी पीड़ा को जब अपने चुटीले अंदाज में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक पहुंचाया तो बात पर मुस्कान जरूर आई, लेकिन उसके पीछे छिपा सवाल सरकार के लिए गंभीर था।

दानू ने कहा—“धामी ज्यू आब् तदुक देर नि लगाओ, जल्दी राजस्व ग्राम बनाओ। ध्यान धरिया हाँ कि यो बिंदुखात्त वाल्नैकि वोट बटी एक विधायक तय हुँ, आब् यैकि अनदेखी नै करिया।”

शब्दों में हास्य था, अंदाज में व्यंग्य था, लेकिन भावनाओं में बिंदुखत्ता का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

सवाल भी सीधा है—जिस बिंदुखत्ता की जनता लोकतंत्र में अपने वोट से विधायक चुनती है, सरकार बनाती है, उसी बिंदुखत्ता के राजस्व ग्राम बनने की मांग पर वर्षों से इंतजार क्यों?

सरकारें बदलती रहीं, चेहरे बदलते रहे, चुनाव आते-जाते रहे, लेकिन बिंदुखत्ता का सवाल अपनी जगह खड़ा रहा। कभी आश्वासन के रूप में, कभी प्रक्रिया के नाम पर और कभी उम्मीद के सहारे। अब ग्रामीणों ने इंतजार को पदयात्रा में बदल दिया है।

मंगलवार को वन अधिकार संगठन बिंदुखत्ता की पदयात्रा का 32वां दिन था। 17 एकड़ से शुरू हुई पदयात्रा सुभाषनगर, पटेलनगर और मुल्तान नगरी होते हुए बाजपुर चौराहे पहुंची। रास्ते में कार्यकर्ताओं ने घर-घर दस्तक दी और लोगों को राजस्व ग्राम के दर्जे की जरूरत और इसके महत्व से अवगत कराया।

यह केवल सड़क पर चलती पदयात्रा नहीं है। यह उन लोगों की आवाज है जो वर्षों से अपने क्षेत्र को राजस्व ग्राम का दर्जा मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। आंदोलन ने अब गांवों के भीतर भी दस्तक देनी शुरू कर दी है। रात में भजन-कीर्तन हो रहे हैं, नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है और 27 सितंबर को प्रस्तावित जनसभा एवं विशाल रैली के लिए ग्रामीणों को जोड़ा जा रहा है।

ऐसे माहौल में जीवन दानू की चुटकी महज चुटकी नहीं रह जाती। वह सरकार को आईना दिखाती नजर आती है।

जनता को वोट के समय अपना कहने वाली राजनीति, क्या अधिकार के समय भी उसी जनता को उतना ही अपना मानती है?

यह सवाल बिंदुखत्ता की गलियों से उठ रहा है। और शायद यही वजह है कि दानू की बात पर हंसी के साथ एक कसक भी महसूस होती है।

उत्तराखंड की राजनीति में जनता से जुड़ाव, अंतिम व्यक्ति तक विकास और जनहित की बातें अक्सर सुनाई देती हैं। लेकिन बिंदुखत्ता पूछ रहा है कि क्या जनहित का मतलब सिर्फ योजनाओं की घोषणा तक है, या वर्षों से लंबित जनमांग पर निर्णायक फैसला लेना भी उसी जनहित का हिस्सा है?

वन अधिकार संगठन का कहना है कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। मांग क्षेत्र के लोगों के मूलभूत अधिकार, सम्मान और भविष्य से जुड़ी है। यही बात इस आंदोलन को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग करती है और सरकार के सामने जवाबदेही का सवाल और बड़ा कर देती है।

32 दिन की पदयात्रा के बाद अब 27 सितंबर की जनसभा और विशाल रैली पर निगाहें हैं। ग्रामीण शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का दावा कर रहे हैं और साफ कह रहे हैं कि सकारात्मक निर्णय होने तक संघर्ष जारी रहेगा।

जीवन दानू ने जिस अंदाज में मुख्यमंत्री को संबोधित किया, उसमें एक कलाकार की मुस्कान जरूर थी, लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक पूरे क्षेत्र की बेचैनी थी।

“धामी ज्यू, अब तदुक देर नि लगाओ…”

शायद यह सिर्फ हास्य कलाकार की आवाज नहीं है। यह उस बिंदुखत्ता की आवाज है जो वर्षों से पूछ रहा है—वोट देने में हम आपके अपने हैं तो अपने अधिकार के लिए इंतजार में इतने पराए क्यों?

अब गेंद सरकार के पाले में है। बिंदुखत्ता सड़क पर है, जनता सवाल कर रही है और जीवन दानू का व्यंग्य उस सवाल को और दूर तक पहुंचा रहा है। देखना यह है कि सरकार इस व्यंग्य में छिपे दर्द को सुनती है या फिर एक और आश्वासन के साथ बिंदुखत्ता को अगली पदयात्रा के लिए छोड़ देती है।

उत्तराखंड