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कांग्रेस के चक्रव्यूह में घिरी भाजपा, किच्छा में दांव पर साख!

राजनीतिक तराजू के एक पलड़े में तिलक राज बेहड़, दूसरे में राजेश शुक्ला—पालिका चुनाव से 2027 की सियासत तक पहुंची जंग।

दर्पण न्यूज 24/7 किच्छा।

नगर पालिका चुनाव की रणभेरी बजते ही किच्छा की सियासत में मुकाबला महज पालिका अध्यक्ष की कुर्सी तक सीमित नहीं रह गया है। चुनावी मैदान में भले ही भाजपा के संदीप अरोड़ा और कांग्रेस के राजेश प्रताप सिंह आमने-सामने हैं, लेकिन राजनीतिक तराजू पर नजर डालें तो एक पलड़े में कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ और दूसरे पलड़े में भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला नजर आ रहे हैं। दोनों खेमों के लिए यह चुनाव स्थानीय निकाय की सत्ता के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक पकड़ की परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है।

किच्छा और सिरौलीकला को अलग-अलग नगर निकाय बनाए जाने के बाद इस बार चुनावी समीकरण भी बदले हैं। कांग्रेस स्थानीय विकास, रोजगार, प्रशासनिक चुनौतियों और जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर भाजपा को घेरने में जुटी है। वहीं भाजपा सरकार की उपलब्धियों और संगठन की ताकत के सहारे चुनावी मैदान में बढ़त बनाने की कोशिश कर रही है।

भाजपा के सामने अपनों को साधने की चुनौती!

भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से ज्यादा अंदरूनी समीकरणों को लेकर दिखाई दे रही है। टिकट वितरण के बाद सामने आई नाराजगी और बागी तेवरों ने संगठन की चिंता बढ़ाई। हालांकि नामांकन वापसी के दौरान कुछ बागियों के मैदान से हटने के बाद पार्टी ने राहत की सांस ली, लेकिन नाराजगी पूरी तरह खत्म हुई या नहीं, इसका असर चुनाव परिणाम में ही स्पष्ट होगा।

भाजपा अब डैमेज कंट्रोल के साथ बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने में जुटी है। पार्टी नेता और कार्यकर्ता घर-घर संपर्क कर प्रत्याशी संदीप अरोड़ा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

कांग्रेस ने बेहड़ के नेतृत्व में बढ़ाया दबाव!

दूसरी ओर कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह के पक्ष में विधायक तिलक राज बेहड़ सक्रिय नजर आ रहे हैं। कांग्रेस भाजपा की कथित अंदरूनी खींचतान को चुनावी मुद्दा बनाने के साथ स्थानीय समस्याओं को लेकर भी मतदाताओं के बीच पहुंच रही है।

कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही है—भाजपा के भीतर की नाराजगी को अपने पक्ष में राजनीतिक अवसर में बदलना और स्थानीय मुद्दों के जरिए सत्ता पक्ष को घेरना।

चेहरे दो, सियासी परीक्षा चार कदम आगे।

किच्छा का चुनाव दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि मैदान में प्रत्याशी भले ही दो प्रमुख चेहरे हों, लेकिन राजनीतिक निगाहें उनके पीछे खड़े नेताओं पर भी टिकी हैं।

एक तरफ तिलक राज बेहड़, दूसरी तरफ राजेश शुक्ला।

एक तरफ कांग्रेस अपनी मौजूदा राजनीतिक पकड़ का प्रदर्शन करना चाहती है तो दूसरी तरफ भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के सामने संगठन और अपने राजनीतिक प्रभाव को साबित करने की चुनौती है।

2027 के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत।

यह चुनाव पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के 2027 के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नगर पालिका चुनाव में भाजपा प्रत्याशी का प्रदर्शन शुक्ला की संगठनात्मक सक्रियता, स्थानीय राजनीतिक पकड़ और कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव को लेकर चर्चाओं को नई दिशा दे सकता है।

हालांकि निकाय चुनाव का परिणाम सीधे विधानसभा चुनाव का भविष्य तय नहीं करता, लेकिन किच्छा जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थानीय चुनाव के नतीजे 2027 की तैयारियों और संभावित राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने वाले संकेत जरूर दे सकते हैं।

दूसरी ओर विधायक तिलक राज बेहड़ के लिए भी यह चुनाव स्थानीय स्तर पर कांग्रेस की पकड़ और अपने नेतृत्व की प्रभावशीलता दिखाने की चुनौती है। ऐसे में पालिका की कुर्सी के लिए शुरू हुई लड़ाई का राजनीतिक असर नगर पालिका की सीमा से बाहर तक जाता दिखाई दे रहा है।

मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा भी चर्चा के केंद्र में।

किच्छा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह जिले ऊधमसिंह नगर का महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र है। ऐसे में भाजपा के लिए यह चुनाव संगठन की जमीनी ताकत और स्थानीय समीकरणों की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।

भाजपा के सामने जहां नाराज कार्यकर्ताओं को पूरी तरह साधने और संगठन को एकजुट रखने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस के सामने भाजपा के इस कथित असंतोष को वोट में बदलने की चुनौती है।

अब चुनावी बिसात पूरी तरह सज चुकी है। राजनीतिक तराजू के एक पलड़े में तिलक राज बेहड़ तो दूसरे में राजेश शुक्ला हैं। सामने पालिका अध्यक्ष की कुर्सी है, लेकिन दांव इससे कहीं बड़ा दिखाई दे रहा है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि मतपेटी खुलने पर किसका पलड़ा भारी होता है—बेहड़ का राजनीतिक प्रभाव या शुक्ला की संगठनात्मक रणनीति? और क्या किच्छा का यह चुनाव 2027 की सियासत में कोई नया संकेत लिखेगा?

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