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बेटे की अचानक मौत के सदमे में मां ने भी गंवाई जान, घटना ने खड़े किए आज के भौतिकवादी युग में मां-बाप और बच्चों के बीच बढ़ती दूरी पर गंभीर सवाल!

पिथौरागढ़। मां बाप के लिए उसकी औलाद सिर्फ परिवार का एक सदस्य नहीं होती, वह उसकी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा होती है। पिथौरागढ़ में सामने आई एक घटना ने इस रिश्ते की गहराई को बेहद पीड़ादायक तरीके से सामने ला दिया। कक्षा नौ में पढ़ने वाले 14 वर्षीय जतिन जोशी की अचानक मौत के बाद उसकी मां पूनम जोशी भी नहीं बच सकीं। बेटे की मौत का सदमा उनके लिए इतना गहरा था कि कुछ ही समय बाद उनकी भी जान चली गई।

जतिन शनिवार को झौलखेत मैदान में दौड़ रहा था। इसी दौरान उसके सीने में तेज दर्द हुआ और वह अचानक गिर पड़ा। परिजन उसे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक तौर पर हृदयाघात की आशंका जताई गई है, जबकि मौत का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद स्पष्ट होने की बात कही गई है।

जतिन के पिता कैलाश जोशी त्रिपुरा में असम राइफल्स में तैनात हैं, जबकि उसकी बहन मध्य प्रदेश में नौकरी करती है। घर में मां और बेटा एक-दूसरे के सबसे करीब थे। बेटे की मौत के बाद मां उसे देखने अस्पताल पहुंचीं। बेटे का शव देखने के बाद वह गहरे सदमे में अस्पताल से निकल गईं। रास्ते में टैक्सी रुकने पर वह उतर गईं और सरयू नदी की ओर चली गईं। काफी तलाश के बाद एसडीआरएफ और पुलिस ने उनका शव बरामद किया।

यह घटना अब सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं रह गई है। यह उस रिश्ते की गहराई को समझने का अवसर भी है, जिसमें मां की दुनिया अक्सर उसकी औलाद के इर्द-गिर्द सिमटी होती है।

बचपन में मां-बाप ही होते हैं पूरी दुनिया

बच्चे की जिंदगी की शुरुआत मां-बाप से होती है। उसकी पहली जरूरत मां समझती है और उसके भविष्य की चिंता पिता करता है। बच्चे की बीमारी में मां रातें जागती है तो उसकी पढ़ाई और भविष्य के लिए पिता अपनी जरूरतों से समझौता करता है। बच्चे की छोटी-सी सफलता भी उनके लिए बड़ी खुशी बन जाती है।

लेकिन समय के साथ बच्चे बड़े होते हैं। पढ़ाई, नौकरी, कारोबार और अपनी गृहस्थी उनकी जिंदगी का हिस्सा बनते हैं। यह जीवन का स्वाभाविक क्रम है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे आगे बढ़ें और अपने पैरों पर खड़े हों।

दिक्कत तब शुरू होती है जब आगे बढ़ने की इस दौड़ में माता-पिता पीछे छूटने लगते हैं।

फोन छोटा होता गया, दूरियां बड़ी

आज की तेज जिंदगी में कई परिवारों में एक अजीब बदलाव दिखाई देता है। बच्चे अपने काम और जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं, जबकि माता-पिता उनके फोन और मिलने के समय का इंतजार करते रहते हैं।

मां का बार-बार फोन करना कभी चिंता के बजाय परेशानी लगने लगता है। पिता की सलाह पुरानी सोच दिखाई देने लगती है। मिलने के लिए समय निकालना कठिन होता जाता है। धीरे-धीरे दूरी सिर्फ शहरों की नहीं रहती, रिश्तों की भी हो जाती है।

माता-पिता अक्सर बच्चों से बड़ी चीजें नहीं मांगते। उन्हें महंगे उपहारों से ज्यादा अपने बच्चों का समय चाहिए। कुछ मिनट की बातचीत, साथ बैठकर चाय पीना और यह भरोसा कि जरूरत पड़ने पर बेटा-बेटी उनके साथ खड़े हैं—कई बार यही उनके लिए सबसे बड़ी खुशी होती है।

सफलता के साथ रिश्ते भी बचाने होंगे

अपने पैरों पर खड़ा होना जरूरी है। करियर बनाना जरूरी है। अपनी जिंदगी और परिवार की जिम्मेदारियां निभाना भी जरूरी है। लेकिन इन सबके बीच माता-पिता के लिए समय बचाना भी उतना ही जरूरी है।

जिन माता-पिता ने बच्चों की जिंदगी बनाने में अपनी उम्र लगा दी, उनके लिए बुढ़ापे में बच्चों की मौजूदगी सबसे बड़ी ताकत होती है। पैसा उनकी जरूरतों का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अपनापन और समय उसका विकल्प नहीं हो सकते।

पिथौरागढ़ की घटना के कारणों और परिस्थितियों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और पोस्टमार्टम के बाद ही सामने आएगा। लेकिन इस घटना का दुख हमें एक सवाल जरूर देता है—क्या हम अपने माता-पिता को उनके रहते वह समय और अपनापन दे पा रहे हैं, जिसके वे हकदार हैं?

मां-बाप की कीमत उनके चले जाने के बाद समझने से बेहतर है कि उनके रहते उन्हें महसूस कराया जाए कि वे हमारी जिंदगी में आज भी उतने ही जरूरी हैं।

क्योंकि मां की दुनिया होती है औलाद, लेकिन औलाद की दुनिया में भी मां-बाप के लिए एक जगह हमेशा बची रहनी चाहिए।

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