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भविष्य की खेती का खाका, किसान मेले में व्यवस्थाओं की परीक्षा!

20 साल के कृषि रोडमैप से जैविक खेती, बाजार और किसान की आय तक मंथन, रिकॉर्ड भीड़ के बीच जाम और अव्यवस्थाओं ने विश्वविद्यालय प्रबंधन को दिया अगली तैयारी का सबक!

पंतनगर। पंतनगर का 120वां अखिल भारतीय किसान मेला इस बार खेत-खलिहान से आगे बढ़कर उत्तराखंड की कृषि के अगले 20 वर्षों की तस्वीर बनाने का मंच भी बना। एक ओर पंत विश्वविद्यालय के नेतृत्व में प्रदेश के लिए दीर्घकालिक कृषि रोडमैप तैयार करने पर विशेषज्ञों ने मंथन किया, वहीं दूसरी ओर किसानों की आय बढ़ाने, प्राकृतिक एवं जैविक खेती, उन्नत बीज और बेहतर बाजार पर विश्वविद्यालय तथा पतंजलि योगपीठ के बीच सहयोग की संभावनाएं सामने आईं। लेकिन मेले में उमड़ी भारी भीड़ ने एक दूसरा सवाल भी खड़ा कर दिया—जब भविष्य की खेती की इतनी बड़ी योजना बन रही है तो भविष्य के किसान मेलों की व्यवस्थाओं का रोडमैप कब तैयार होगा?

उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश की कृषि के अगले 20 वर्षों का रोडमैप तैयार करने की जिम्मेदारी गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को सौंपी है। कुलपति डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप के नेतृत्व में तीन और चार अक्टूबर को हुई दो दिवसीय बैठक में प्रदेशभर के 50 से अधिक अधिकारियों और 100 से अधिक संकाय सदस्यों ने भाग लिया। कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पंत विश्वविद्यालय, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा और औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय भरसार के विशेषज्ञों ने कृषि के भविष्य की प्राथमिकताओं पर मंथन किया।

बैठक में केवल लक्ष्य तय करने तक बात सीमित नहीं रही, बल्कि रोडमैप के लिए जरूरी आंकड़ों, विषयगत समूहों की जिम्मेदारियों और उनकी कार्यप्रणाली पर विस्तार से चर्चा हुई। समितियों और उनके समन्वयकों को अक्टूबर के अंत तक पहला मसौदा तैयार करना है। प्रस्तावित रोडमैप में जलवायु परिवर्तन, कृषि का डिजिटलीकरण, बदलती कृषि परिस्थितियां, किसानों की आय, तकनीकी हस्तांतरण, बाजार और नई कृषि तकनीकों जैसे विषयों को शामिल किया जा रहा है।

इस बीच किसान मेले के दूसरे दिन पतंजलि योगपीठ ने पंत विश्वविद्यालय के साथ व्यापक सहयोग का प्रस्ताव रखकर कृषि को उत्पादन से बाजार तक जोड़ने की दिशा में नई संभावना पैदा की। पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आचार्य बालकृष्ण ने प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ किसानों को उन्नत बीज, पौध सामग्री, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि किसान की आय केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि उसके उत्पाद को सही बाजार और बेहतर मूल्य दिलाने से बढ़ेगी। औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों, आंवला और अन्य कृषि उत्पादों को प्रसंस्करण से जोड़ने पर जोर देते हुए उन्होंने पंत विश्वविद्यालय के साथ प्रमाणित बीज एवं पौध सामग्री तथा संभावित बाय-बैक मॉडल पर सहयोग की इच्छा जताई। यह पहल जमीन पर उतरती है तो किसानों को उत्पादन के साथ बाजार की गारंटी देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

मेले में जनजातीय समुदायों को आधुनिक कृषि और स्वरोजगार से जोड़ने वाली आदिग्राम परियोजना भी चर्चा में रही। परियोजना के तहत करीब 17 हजार जनजातीय परिवारों का डेटाबेस तैयार कर उन्हें जियो-टैग एवं डिजिटल रूप से दर्ज किया गया है। पांच हजार से अधिक किसानों और 15 हजार से अधिक लोगों को आजीविका एवं कौशल प्रशिक्षण दिया गया, जबकि एक हजार से अधिक स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को विभिन्न गतिविधियों से जोड़ा गया। डिजिटल कृषि, मोबाइल एप, जैविक खेती, हस्तशिल्प और मशरूम उत्पादन जैसी गतिविधियों के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

550 से अधिक स्टालों वाला किसान मेला किसानों के लिए नई तकनीक, उन्नत बीज, कृषि उपकरण और वैज्ञानिक खेती की जानकारी का बड़ा मंच बना हुआ है। यही पंतनगर की सबसे बड़ी ताकत है कि विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला और शोध को सीधे खेत तक पहुंचाने का अवसर मिलता है। लेकिन मेले की बढ़ती लोकप्रियता ने उसकी व्यवस्थाओं की क्षमता पर भी सवाल खड़े कर दिए।

भारी भीड़ के बीच कई स्थानों पर यातायात का दबाव बढ़ा और जाम की स्थिति बनी। वाहनों की आवाजाही, पार्किंग और भीड़ नियंत्रण को लेकर व्यवस्था पर दबाव साफ दिखाई दिया। बड़ी संख्या में किसान और आम लोग मेले में पहुंच रहे हों तो प्रवेश और निकास की अलग व्यवस्था, पर्याप्त पार्किंग, यातायात डायवर्जन, पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित मार्ग, पेयजल, चिकित्सा सहायता और स्पष्ट सूचना तंत्र पहले से तैयार होना जरूरी है।

दरअसल, पंतनगर किसान मेले की सफलता अब सिर्फ स्टालों की संख्या, आगंतुकों की भीड़ या प्रदर्शित तकनीक से नहीं मापी जाएगी। मेले में आने वाला किसान कितनी आसानी से पहुंचा, वाहन कहां खड़ा किया, परिसर में उसे कितनी सुविधा मिली और वापस लौटते समय उसे जाम में कितना समय गंवाना पड़ा—ये सवाल भी आयोजन की सफलता का हिस्सा हैं।

इस बार की भीड़ विश्वविद्यालय प्रबंधन के लिए चेतावनी से ज्यादा एक अवसर है। यदि किसान मेला हर वर्ष बड़ा हो रहा है तो पार्किंग, ट्रैफिक, प्रवेश-निकास और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था भी उसी अनुपात में बढ़ानी होगी। अगली बार अचानक बढ़ी भीड़ का इंतजार करने के बजाय संभावित संख्या के आधार पर पहले से ट्रैफिक और पार्किंग प्लान तैयार करना होगा।

पंतनगर आज उत्तराखंड की कृषि के अगले 20 वर्षों का रोडमैप तैयार कर रहा है। जरूरत सिर्फ खेत की अगली फसल की योजना बनाने की नहीं, किसान मेले के अगले संस्करण की भी योजना बनाने की है। क्योंकि जिस विश्वविद्यालय से प्रदेश की भविष्य की खेती की दिशा तय होने वाली है, उसके किसान मेले की व्यवस्थाएं भी उसी भविष्य की तस्वीर पेश करें—यही इस बार की भीड़ और जाम से मिला सबसे बड़ा सबक है।

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