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सीमांत तक पहुंची धामी सरकार, बनबसा में पहली बार कैबिनेट!

देहरादून से बाहर निकली कैबिनेट की मेज, सीमांत की जमीन पर बैठे सरकार के नुमाइंदे; विकास और स्थानीय सरोकारों पर कई अहम फैसले!

देहरादून/चम्पावत। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से निकलकर धामी सरकार पहली बार चम्पावत के सीमांत क्षेत्र बनबसा पहुंची। भारत-नेपाल सीमा से सटे बनबसा स्थित एनएचपीसी परिसर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल की बैठक हुई। चम्पावत जिले में पहली बार आयोजित कैबिनेट बैठक में सरकार ने कई महत्वपूर्ण फैसलों पर मुहर लगाई।

कैबिनेट बैठक को महज सरकारी बैठक के बजाय सीमांत क्षेत्रों तक शासन की सीधी पहुंच बनाने की पहल के तौर पर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री धामी ने साफ किया कि कैबिनेट की बैठकें अब केवल देहरादून तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि प्रदेश के अलग-अलग जिलों में भी आयोजित की जाएंगी। सरकार का तर्क है कि इससे स्थानीय समस्याओं, विकास की जरूरतों और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को करीब से समझने तथा उन पर निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

सीमांत क्षेत्र बनबसा में कैबिनेट की बैठक आयोजित कर सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों को शासन की प्राथमिकताओं से बाहर नहीं रखा जाएगा। मुख्यमंत्री ने सीमांत क्षेत्रों को देश की सुरक्षा, संस्कृति और विकास की महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए कहा कि यहां रहने वाले लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना सरकार की प्राथमिकता है।

सरकार के सामने सीमांत क्षेत्रों में सड़क और बेहतर कनेक्टिविटी, रोजगार, पर्यटन, आधारभूत सुविधाओं और स्थानीय स्तर पर विकास को गति देने जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में राजधानी से बाहर कैबिनेट बैठकें आयोजित करने का असली महत्व तभी सामने आएगा, जब इन बैठकों में उठने वाले स्थानीय मुद्दे फाइलों से निकलकर जमीन पर दिखाई दें।

मुख्यमंत्री ने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों में कैबिनेट बैठकें होने से स्थानीय परिस्थितियों और जन अपेक्षाओं को नजदीक से समझने का अवसर मिलेगा। साथ ही क्षेत्र विशेष से जुड़े विषयों पर त्वरित और प्रभावी निर्णय लेने का रास्ता भी खुलेगा।

कैबिनेट में दिखी देवभूमि की लोक संस्कृति

बनबसा की कैबिनेट बैठक में शासन और संस्कृति का अनूठा संगम भी देखने को मिला। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और मंत्रिमंडल के सदस्यों को चम्पावत की प्रसिद्ध लोक परंपरा से जुड़ी ‘फर्रा/छन्तोली’ भेंट की गई।

देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल परंपरा से जुड़ी यह पारंपरिक ढाल देवभूमि की लोक संस्कृति और परंपरागत विरासत की पहचान मानी जाती है। बांस अथवा रिंगाल की खपच्चियों से तैयार की जाने वाली छतरीनुमा ढाल बग्वाल परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों को फर्रा/छन्तोली भेंट किया जाना सिर्फ एक सांस्कृतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सीमांत चम्पावत की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को शासन के केंद्र में रखने का संदेश भी रहा।

अब निगाह इस बात पर रहेगी कि बनबसा में बैठी कैबिनेट के फैसले सीमांत की जमीन पर कितनी तेजी से उतरते हैं। क्योंकि दूरस्थ क्षेत्रों तक सरकार की पहुंच का असली पैमाना बैठक की जगह नहीं, बल्कि उसके बाद दिखाई देने वाला विकास होगा।

 

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