








लालकुआं में भाजपा टिकट की दावेदारी ने बढ़ाई सियासी सरगर्मी!
बिष्ट-दुमका के साथ चंदोला, उमेश शर्मा, कमल मुनि और दीपेंद्र कोश्यारी के नाम चर्चा में, स्थानीय संगठन की कसौटी पर तय होगी दावेदारी की मजबूती!
प्रमोद बमेटा
लालकुआं। विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच लालकुआं सीट पर भाजपा के भीतर टिकट को लेकर संभावित दावेदारों की सक्रियता ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है। मौजूदा विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट और पूर्व विधायक नवीन दुमका के साथ ही इस बार संगठन और क्षेत्रीय राजनीति में लंबे समय से सक्रिय कई चेहरे अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। इनमें जग्गी बंगर जिला पंचायत सीट से दो बार जीत दर्ज कर चुके कमलेश चंदोला, भाजपा संगठन में विभिन्न दायित्व निभाने वाले राज्य आंदोलनकारी उमेश शर्मा, हिंदूवादी नेता कमल मुनि तथा पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के भतीजे दीपेंद्र कोश्यारी का नाम प्रमुख रूप से चर्चा में है।
लालकुआं सीट पर भाजपा के सामने इस बार केवल चुनाव जीतने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि टिकट वितरण में अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों के बीच संतुलन साधने की चुनौती भी होगी। यही कारण है कि संभावित दावेदारों की सक्रियता को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
मौजूदा विधायक के सामने प्रदर्शन का सवाल!
डॉ. मोहन सिंह बिष्ट वर्तमान में लालकुआं के विधायक हैं। ऐसे में टिकट की दौड़ में उनका नाम स्वाभाविक रूप से सबसे प्रमुख दावेदारों में शामिल है। पांच साल के कार्यकाल के बाद उनके सामने जहां अपने राजनीतिक प्रदर्शन और क्षेत्र में स्वीकार्यता को लेकर जनता की कसौटी होगी, वहीं संगठन के भीतर भी उनका समर्थन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
पूर्व विधायक के पास अनुभव की पूंजी!
पूर्व विधायक नवीन दुमका के पास विधानसभा और संगठन दोनों का अनुभव है। क्षेत्र की राजनीति में उनकी पुरानी पकड़ और कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क उनकी दावेदारी का प्रमुख आधार माना जाता है। यदि पार्टी अनुभव और चुनावी प्रबंधन को प्राथमिकता देती है तो दुमका का नाम मजबूत दावेदारों में बना रह सकता है।
जमीनी कार्यकर्ता की दावेदारी भी महत्वपूर्ण
भाजपा के भीतर जमीनी कार्यकर्ताओं को अवसर देने की चर्चा के बीच कमलेश चंदोला की दावेदारी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जग्गी बंगर जिला पंचायत सीट पर दो बार जीत हासिल कर चुके चंदोला ने स्थानीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पकड़ का प्रदर्शन किया है। लंबे समय से पार्टी संगठन के साथ सक्रिय रहने के कारण उनकी दावेदारी स्थानीय कार्यकर्ता बनाम स्थापित चेहरे की बहस को भी जन्म देती है।
राज्य आंदोलनकारी उमेश शर्मा भी संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके हैं। क्षेत्र में लंबे समय से सक्रियता और संगठनात्मक अनुभव के आधार पर उनकी दावेदारी भी चर्चा में है। वहीं हिंदुत्व के मुद्दों पर सक्रिय कमल मुनि का नाम पार्टी के वैचारिक आधार से जुड़े संभावित चेहरों के रूप में सामने आता है।
दीपेंद्र कोश्यारी की सक्रियता ने बढ़ाई दिलचस्पी!
इन सबके बीच पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के भतीजे दीपेंद्र कोश्यारी की लालकुआं से दावेदारी ने राजनीतिक समीकरण को और दिलचस्प बना दिया है। दीपेंद्र कोश्यारी क्षेत्र को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाने की दिशा में सक्रिय नजर आ रहे हैं।
उनके सामने सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत जहां पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी की विरासत और राजनीतिक पहचान हो सकती है, वहीं चुनौती यह होगी कि वह स्थानीय स्तर पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक स्वीकार्यता और संगठनात्मक पकड़ कितनी मजबूत कर पाते हैं।
स्थानीय बनाम राजनीतिक विरासत का सवाल!
लालकुआं भाजपा में टिकट की संभावित दौड़ को केवल व्यक्तियों के बीच मुकाबले के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे स्थानीय कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं, संगठनात्मक समीकरण, चुनावी जीत की संभावनाएं, सामाजिक संतुलन और प्रत्याशी की क्षेत्र में स्वीकार्यता जैसे कई पहलू जुड़े होंगे।
ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने भी आसान विकल्प नहीं होगा। मौजूदा विधायक को दोहराने से लेकर पूर्व विधायक पर भरोसा जताने, जमीनी कार्यकर्ता को अवसर देने अथवा राजनीतिक विरासत वाले नए चेहरे को मैदान में उतारने तक कई विकल्प मौजूद हैं।
फिलहाल दावेदारियां सामने हैं, लेकिन अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है।
लालकुआं में भाजपा की टिकट की यह संभावित जंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस चेहरे को पार्टी मैदान में उतारेगी, उसके सामने केवल विपक्ष से मुकाबला नहीं होगा, बल्कि चुनाव से पहले पार्टी के भीतर मौजूद अलग-अलग अपेक्षाओं और समीकरणों को भी साथ लेकर चलने की चुनौती होगी।
2027 की चुनावी बिसात पर अभी कई चालें चलनी बाकी हैं। फिलहाल लालकुआं भाजपा में सबसे बड़ा सवाल यही है,पार्टी अनुभव पर भरोसा करेगी, वर्तमान पर दांव लगाएगी, जमीनी कार्यकर्ता को अवसर देगी या राजनीतिक विरासत के नए चेहरे को आगे बढ़ाएगी?
