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शिकारी से संरक्षक बनाने वाले की विरासत लौट आई कॉर्बेट—सात समंदर पार से आए पोते का ऐतिहासिक संदेश |

दर्पण न्यूज 24/7 एक्सक्लूसिव
रामनगर। उत्तराखंड के गौरव और भारतीय वन्यजीव फोटोग्राफी के जनक एफ़. डब्ल्यू. चैंपियन की स्मृति में रामनगर महाविद्यालय में विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस मौके पर सात समंदर पार से आए उनके पोते जेम्स चैंपियन ने इंटरैक्टिव सत्र व प्रस्तुति के जरिए अपने दादा के जीवन, कार्यों और वन्यजीव संरक्षण में अतुलनीय योगदान को नई पीढ़ी से रूबरू कराया।
जेम्स चैंपियन ने बताया कि 1920–30 के दशक में उनके दादा कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व क्षेत्र में रहे और काम किया। उन्होंने जंगल में बाघों की प्राकृतिक परिवेश में ऐतिहासिक तस्वीरें लेकर दुनिया के सामने पेश कीं—जब शिकार का चलन आम था, तब कैमरे से संरक्षण का संदेश दिया।
उन्होंने यह भी साझा किया कि उनके दादा का प्रसिद्ध शिकारी से लेखक बने जिम कॉर्बेट से गहरा मित्रतापूर्ण रिश्ता था। इसी मित्रता ने जिम कॉर्बेट को शिकार छोड़कर बाघ संरक्षण, वन्यजीव फोटोग्राफी और लेखन की राह पर मोड़ा।
जेम्स ने भावुक होकर कहा कि जिस धरती पर उनके दादा ने जीवन बिताया, वहीं लौटना गर्व का क्षण है। उन्होंने ढिकाला क्षेत्र में स्थित चैंपियन पूल और वहां जाने वाली चैंपियन रोड का ज़िक्र करते हुए बताया कि उनके दादा-दादी यहां मछली पकड़ना पसंद करते थे—इसी विरासत से यह नाम आज तक जुड़ा है।
इस अवसर पर वन्यजीव प्रेमी एवं संरक्षण विशेषज्ञ संजय छिम्वाल ने कहा कि एफ.डब्ल्यू. चैंपियन ने 1924 में जंगल में पहली बार बाघ की तस्वीर लेकर दुनिया को दिखाया—जब लोग बंदूक उठाते थे, तब उन्होंने कैमरा उठाकर संरक्षण का रास्ता दिखाया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हर बाघ की धारियां अलग होती हैं—आज टाइगर रिज़र्व में पहचान व गणना की आधुनिक तकनीकें इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।
पीढ़ियों को जोड़ती विरासत: कैमरे से बचाए गए बाघों की कहानी आज उनके पोते के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंची—कॉर्बेट की धरती पर संरक्षण की मशाल फिर रोशन हुई।