खबरें शेयर करें -

“हरित आक्रमण” बना खतरा: लैंटाना ने तराई की जैव विविधता पर कसा शिकंजा
— नियंत्रण के लिए ठोस योजना और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो| रुद्रपुर
तराई क्षेत्र के वनों में तेजी से फैल रही लैंटाना झाड़ी अब जंगलों की प्राकृतिक संरचना और जैव विविधता के लिए गंभीर संकट बनती जा रही है। विशेषज्ञ इसे “धीमी लेकिन घातक बीमारी” करार देते हुए चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में जंगल अपनी मूल पहचान खो सकते हैं।
ब्रिटिश काल में सजावटी पौधे के रूप में भारत लाई गई यह विदेशी प्रजाति आज देश के लिए बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बन चुकी है। जानकारी के अनुसार, लैंटाना अब भारत के लगभग 40 से 44 प्रतिशत जंगलों में फैल चुकी है और करीब तीन लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र इसकी चपेट में है।
तराई पश्चिमी वन प्रभाग के बन्नाखेड़ा क्षेत्र सहित कई जंगलों में लैंटाना ने घनी झाड़ियों का रूप ले लिया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी अत्यधिक अनुकूलन क्षमता है—यह पौधा गर्मी, नमी, सूखे और हर तरह की मिट्टी में तेजी से फैलता है। इसके बीज पक्षियों और जानवरों के माध्यम से दूर-दूर तक फैल जाते हैं, जिससे इसका विस्तार और तेज हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लैंटाना जंगल की जमीन को पूरी तरह ढक लेता है, जिससे सूर्य का प्रकाश नीचे तक नहीं पहुंच पाता। इसका सीधा असर स्थानीय वनस्पतियों और घास पर पड़ता है, जो धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। इससे पेड़ों की नई पौध तैयार होने की प्रक्रिया भी बाधित होती है और जंगलों का प्राकृतिक पुनरुत्पादन प्रभावित होता है।
वन्यजीवों पर भी इसका नकारात्मक असर साफ दिखाई दे रहा है। घास और अन्य खाद्य पौधों की कमी के कारण जंगली जानवरों के भोजन स्रोत घट रहे हैं, जबकि पक्षियों की कई प्रजातियों में गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके अलावा, लैंटाना की सूखी झाड़ियां जंगलों में आग लगने के खतरे को भी कई गुना बढ़ा देती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसके दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं। यह चरागाहों को खत्म कर देता है और इसके जहरीले पत्ते पशुओं के लिए नुकसानदायक साबित होते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए बहु-स्तरीय रणनीति जरूरी है। प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर लैंटाना को जड़ से हटाने के साथ-साथ स्थानीय प्रजातियों का पुनरोपण किया जाना चाहिए, ताकि जंगलों की प्राकृतिक संरचना बहाल हो सके।
साथ ही, लैंटाना से बने फर्नीचर और हस्तशिल्प उत्पादों को बढ़ावा देकर इसे आर्थिक संसाधन में बदला जा सकता है, जिससे इसके नियंत्रण अभियान को गति मिल सकती है।
फिलहाल, लैंटाना का बढ़ता प्रभाव एक गंभीर चेतावनी है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि इस “हरित आक्रमण” पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह समस्या भविष्य में और विकराल रूप ले सकती है।

उत्तराखंड