

कॉर्बेट के जंगलों से कहां गायब हो गए मोर और जंगली मुर्गे? 9 महीने से कम दिख रहे पक्षी, क्या खतरे में है जंगल की जैव विविधता!
बाघों के लिए दुनिया में मशहूर कॉर्बेट में अब छोटे वन्यजीवों की मौजूदगी पर उठे सवाल; मोर, रेड जंगल फाउल और कलीज फीजेंट की घटती साइटिंग से वन्यजीव प्रेमी चिंतित, वन विभाग तक पहुंचा मामला!
दर्पण न्यूज 24/7 | रामनगर।
कॉर्बेट के जंगलों में बाघों की दहाड़ तो दुनिया सुन रही है, लेकिन जंगल के बीच कभी आसानी से दिखाई देने वाले मोर, जंगली मुर्गे और कलीज फीजेंट आखिर कहां चले गए? क्या जंगल की बदलती परिस्थितियां इन पक्षियों को उनके पारंपरिक ठिकानों से दूर कर रही हैं या फिर कॉर्बेट के पारिस्थितिकी तंत्र में कोई ऐसा बदलाव हो रहा है, जिस पर अब तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया?
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और उससे लगे वन क्षेत्रों में पिछले आठ से नौ महीनों से इन पक्षियों की साइटिंग कम होने की शिकायतों ने वन्यजीव प्रेमियों, नेचर गाइडों और पक्षी विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। मामला अब वन विभाग तक पहुंच चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल पक्षियों के कम दिखाई देने का मामला है या जंगल की सेहत को लेकर कोई गंभीर संकेत?
कॉर्बेट के ढिकाला, बिजरानी, ढेला, झिरना और फाटो जैसे पर्यटन क्षेत्रों में लंबे समय से सफारी कराने वाले नेचर गाइडों का कहना है कि पहले मोर, रेड जंगल फाउल यानी जंगली मुर्गे और कलीज फीजेंट अक्सर दिखाई देते थे, लेकिन पिछले कुछ महीनों में इनकी साइटिंग पहले जैसी नहीं रह गई है। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई वैज्ञानिक सर्वेक्षण सामने नहीं आया है, जिससे इन पक्षियों की वास्तविक आबादी में गिरावट की पुष्टि हो सके।
घना जंगल या बदलता पर्यावरण, आखिर क्या है वजह?
पक्षियों की घटती साइटिंग के पीछे कई संभावित कारण सामने आ रहे हैं। मानसून के बाद जंगल में छोटी वनस्पतियों यानी अंडरग्रोथ का घनत्व बढ़ने से जमीन पर भोजन तलाशने वाले पक्षियों को देख पाना मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, मौसम के चक्र में बदलाव, भोजन और पानी की उपलब्धता में अंतर, प्राकृतिक आवास में परिवर्तन तथा बीमारी भी संभावित कारण हो सकते हैं।
वन्यजीव प्रेमियों ने बर्ड फ्लू और अन्य संक्रमणों की आशंका को भी जांच के दायरे में रखने की जरूरत बताई है। हालांकि, फिलहाल इनमें से किसी कारण की पुष्टि नहीं हुई है।
पर्यटन और निर्माण गतिविधियों पर भी उठे सवाल!
वन्यजीव प्रेमी और नेचर गाइड प्रशांत ने कॉर्बेट के आसपास बढ़ते पर्यटन और व्यावसायिक निर्माण को भी इस पूरे मामले से जोड़कर देखने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि पिछले करीब एक साल में जंगली मुर्गों, कलीज फीजेंट और मोर की साइटिंग में कमी महसूस हुई है। बदलते मौसम के बीच कुछ पक्षियों के अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दिखाई देने की जानकारी भी मिली है।
वरिष्ठ नेचर गाइड एवं पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट का मानना है कि भौगोलिक परिस्थितियों में बदलाव, जलवायु परिवर्तन, बीमारी अथवा पक्षियों का पारंपरिक क्षेत्रों से दूसरी जगहों की ओर जाना इसके संभावित कारण हो सकते हैं।
वन्यजीव प्रेमी इमरान खान ने इको-सेंसिटिव जोन के नियमों का सख्ती से पालन कराने, निर्माण गतिविधियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने और विकास परियोजनाओं में हरित क्षेत्र सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताई है।
गिद्धों का उदाहरण देकर उठाई वैज्ञानिक शोध की मांग!
वन्यजीव प्रेमी सुमंता घोष ने जमीन पर भोजन तलाशने वाले पक्षियों की घटती साइटिंग को गंभीरता से लेने की बात कही है। उनके अनुसार कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल, शहरीकरण, प्राकृतिक घोंसलों के स्थानों का खत्म होना और भोजन की उपलब्धता में बदलाव पक्षियों के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
उन्होंने गिद्धों की आबादी में आई गिरावट का उदाहरण देते हुए कहा कि वैज्ञानिक शोध के बाद पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा को गिद्धों की मौत और उनकी आबादी में गिरावट का प्रमुख कारण पाया गया था। इसी तरह कॉर्बेट लैंडस्केप में पक्षियों की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए भी व्यवस्थित वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
वन विभाग ने लिया संज्ञान, जुटाई जाएगी फील्ड रिपोर्ट!
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की उपनिदेशक सिरिन पंडित ने बताया कि नेचर गाइडों की ओर से पक्षियों की साइटिंग कम होने का मामला विभाग के संज्ञान में लाया गया है। मानसून के बाद जंगल में अंडरग्रोथ बढ़ने से कई बार पक्षियों को देख पाना मुश्किल हो जाता है। यदि समस्या व्यापक स्तर पर सामने आती है तो उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी देकर नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
वहीं तराई पश्चिमी वन प्रभाग के डीएफओ पुनीत तोमर ने बताया कि नेचर गाइडों की ओर से साझा की गई जानकारी और वीडियो का संज्ञान लिया गया है। फील्ड स्टाफ से जानकारी और उनकी टिप्पणियां जुटाई जाएंगी। इसके बाद मामले में उच्च स्तर पर वैज्ञानिक शोध की सिफारिश की जाएगी।
अब जवाब चाहिए: क्या जंगल की सेहत पर हो रहा है कोई बड़ा बदलाव?
कॉर्बेट की पहचान केवल बाघों से नहीं है। यहां की जैव विविधता में छोटे-बड़े स्तनधारी जीवों के साथ हजारों तरह के पक्षियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में मोर, जंगली मुर्गे और कलीज फीजेंट की साइटिंग में कमी को केवल पर्यटन से जुड़ी सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जरूरत है कि इन पक्षियों की नियमित गणना कराई जाए, पुराने आंकड़ों से तुलना हो, उनके प्रजनन और आवास क्षेत्रों का अध्ययन किया जाए तथा बीमारी और भोजन की उपलब्धता जैसे पहलुओं की भी जांच हो।
क्योंकि जंगल की असली सेहत सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाती कि वहां कितने बाघ हैं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वहां रहने वाले छोटे-बड़े जीव और पक्षी कितने सुरक्षित हैं।
कॉर्बेट में बाघों की गिनती दुनिया करती है, अब सवाल यह है कि जंगल के इन खामोश बाशिंदों की सुध कौन लेगा?
