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मौत के मुहाने से जिंदगी की ओर लौटा नन्हा गजराज, इलाज के बाद अपने झुंड से जा मिला!

एक मीटर गहरे गड्ढे में फंसकर बेबस हो गया था आठ वर्षीय हाथी, वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस की जद्दोजहद रंग लाई!

देहरादून। जंगल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे एक युवा गजराज को आखिरकार नई जिंदगी मिल गई। करीब एक मीटर गहरे गड्ढे में फंसने से घायल हुए लगभग आठ वर्षीय जंगली हाथी को उत्तराखंड वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस की संयुक्त टीम ने न केवल सुरक्षित बचाया, बल्कि उपचार के बाद उसे उसके झुंड से भी मिला दिया। वन्यजीव संरक्षण की यह कामयाबी एक बार फिर इंसान और वन्यजीवों के बीच संवेदनशील रिश्ते की मिसाल बन गई।

घटना 25 अक्टूबर की रात पीपल पड़ाव वन रेंज की है। यहां एक युवा हाथी गहरे गड्ढे में फंस गया था। काफी मशक्कत के बाद उसे बाहर तो निकाल लिया गया, लेकिन उसकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। वह अपने पैरों पर खड़ा तक नहीं हो पा रहा था। उसकी हालत देखकर वन विभाग की पशु चिकित्सा टीम ने तत्काल उपचार शुरू किया और लगातार निगरानी रखी।

हाथी की गंभीर स्थिति को देखते हुए वाइल्डलाइफ एसओएस के विशेषज्ञों को भी अभियान में शामिल किया गया। चिकित्सकीय जांच में उसकी पीठ के ऊपरी हिस्से में सूजन मिली। एक्स-रे में कोमल ऊतकों की चोट और रीढ़ के ऊपरी हिस्से के प्रभावित होने की आशंका सामने आई। हाथी अपने चारों पैरों को हिला पा रहा था, लेकिन अगले पैरों पर शरीर का वजन नहीं संभाल पा रहा था।

इसके बाद शुरू हुई उसे दोबारा खड़ा करने की चुनौती। विशेषज्ञों ने तरल पदार्थ देकर शरीर में पानी की कमी दूर की, लेजर थेरेपी, दर्द प्रबंधन और घाव की ड्रेसिंग सहित जरूरी उपचार किया। जेसीबी और स्लिंग की मदद से उसे खड़ा करने के प्रयास भी किए गए, लेकिन शुरुआती कोशिश नाकाम रही।

लगातार उपचार और निगरानी के बीच उम्मीद की किरण तब दिखाई दी, जब हाथी ने 8 से 10 किलो हरा चारा और 15 से 20 लीटर पानी पीना शुरू किया। उसकी हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। आखिरकार एक और प्रयास में युवा गजराज बिना किसी सहारे के अपने पैरों पर खड़ा हो गया। हालांकि दाहिने अगले पैर में सूजन और लंगड़ाहट बनी हुई थी, जिसके लिए उपचार जारी रखा गया।

और फिर हुआ सबसे सुखद पल…

खड़े होने की ताकत लौटने के बाद हाथी ने अपने झुंड की ओर रुख किया और आखिरकार अपने साथियों के बीच जा पहुंचा। जिस गजराज के दोबारा खड़े होने पर भी संशय था, उसका अपने परिवार से मिलना इस पूरे बचाव अभियान का सबसे भावुक और सुखद पड़ाव बन गया।

यह सफलता बताती है कि समय पर मदद, विशेषज्ञों का अनुभव और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता मिलकर किसी बेजुबान की जिंदगी बचाने में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

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