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अतिक्रमण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बुलडोजर चलाने से पहले सुनना होगा पक्ष, चार महीने तक कार्रवाई पर रोक!

रामनगर के पूछड़ी और रानीखेत रोड के निवासियों को अंतरिम राहत, तीन सप्ताह में मांगी अतिक्रमण पर स्टेटस रिपोर्ट, सरकारी जमीनों की होगी जियो मैपिंग!

हाईकोर्ट से लामाचौड़ के एमआईईटी कॉलेज को राहत, 35 लाख की सिक्योरिटी डिपॉजिट पर रोक!

नैनीताल। सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई और प्रभावित लोगों के अधिकारों को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि रामनगर के पूछड़ी और रानीखेत रोड क्षेत्र के निवासियों का पक्ष सुने बिना उनके निर्माणों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोर्ट ने फिलहाल चार महीने तक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए प्रशासन को संबंधित लोगों की बात सुनने के निर्देश दिए हैं।

प्रदेश में सड़कों, नालों, वन भूमि, राष्ट्रीय राजमार्गों और स्थानीय निकायों की जमीन पर अतिक्रमण के मामले में हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका के रूप में दर्ज मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया गया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय समिति को तीन सप्ताह के भीतर स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

अदालत ने सभी संबंधित विभागों को सरकारी भूमि की जियो मैपिंग कराने और उसका विवरण अपने डिजिटल पोर्टल पर सार्वजनिक करने को कहा है। इसका उद्देश्य सरकारी संपत्तियों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना और भविष्य में होने वाले अतिक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करना है।

कोर्ट ने वन पंचायतों की सीमाएं निर्धारित करने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही रामनगर के पूछड़ी और रानीखेत रोड के निवासियों को कहा है कि वे प्रशासन के समक्ष अपना पक्ष रखें, ताकि उनकी आपत्तियों और समस्याओं पर विचार किया जा सके। अदालत ने वन क्षेत्र से लगे इलाकों में रोजमर्रा की आजीविका के लिए काम करने वाले स्थानीय लोगों की समस्याओं का समाधान करने पर भी जोर दिया है।

पदमपुरी के अतिक्रमण से शुरू हुआ मामला, अब पूरे प्रदेश की सरकारी जमीन पर नजर!

दरअसल, यह मामला नैनीताल जिले के पदमपुरी क्षेत्र में वन विभाग की भूमि पर हुए अतिक्रमण की शिकायत से शुरू हुआ था। दिल्ली निवासी एक व्यक्ति ने इस संबंध में पत्र लिखकर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश का ध्यान आकर्षित किया था। हाईकोर्ट ने पत्र का संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया था।

इससे पहले 17 अक्टूबर 2023 को भी अदालत ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों और प्रभागीय वनाधिकारियों (डीएफओ) को अतिक्रमण हटाकर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे। आदेशों के अनुपालन को लेकर दोबारा सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। अदालत ने खाम भूमि समेत अन्य स्थानों पर बनाए गए अवैध रिसॉर्ट और अन्य अतिक्रमणों को हटाने के निर्देश भी दिए हैं।

अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में अब पारदर्शिता और सुनवाई दोनों जरूरी!

हाईकोर्ट के निर्देशों से सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने की प्रक्रिया के साथ प्रभावित लोगों को सुनवाई का अवसर देने का सवाल भी केंद्र में आ गया है। अदालत के आदेश का संदेश साफ है कि सरकारी भूमि की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। अब निगाहें तीन सप्ताह में दाखिल होने वाली स्टेटस रिपोर्ट और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर रहेंगी।

हाईकोर्ट से लामाचौड़ के एमआईईटी कॉलेज को राहत, 35 लाख की सिक्योरिटी डिपॉजिट पर रोक!

बीबीए-बीसीए की संबद्धता के नाम पर सुरक्षा राशि वसूलने के विश्वविद्यालय के आदेश को चुनौती, चार फरवरी 2027 को अगली सुनवाई

नैनीताल। हल्द्वानी के लामाचौड़ स्थित एमआईईटी शिक्षण संस्थान को उत्तराखंड हाईकोर्ट से बड़ी अंतरिम राहत मिली है। अदालत ने बीबीए और बीसीए पाठ्यक्रमों की संबद्धता के लिए कुमाऊं विश्वविद्यालय की ओर से मांगी गई 35 लाख रुपये की सिक्योरिटी डिपॉजिट की वसूली पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने मामले में सभी प्रतिवादियों को छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

मामला कुमाऊं विश्वविद्यालय की ओर से सात जुलाई 2026 को जारी उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें एमआईईटी संस्थान को बीबीए और बीसीए पाठ्यक्रमों की संबद्धता के एवज में 35 लाख रुपये सुरक्षा धनराशि जमा करने को कहा गया था। संस्थान ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए विश्वविद्यालय की मांग को मनमाना और यूजीसी के नियमों के विपरीत बताया।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संस्थान पहले से ही अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) से विनियमित है। ऐसे में संबद्धता के लिए उससे अतिरिक्त सिक्योरिटी डिपॉजिट की मांग उचित नहीं है।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष 14 दिसंबर 2016 के शासनादेश का भी संदर्भ आया। इस पर यह बात सामने आई कि शासनादेश उन संस्थानों पर लागू होता है, जो किसी अन्य कानून अथवा नियामक व्यवस्था के अधीन नहीं हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने उक्त शासनादेश के आधार पर एमआईईटी से सुरक्षा राशि वसूलने पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई चार फरवरी 2027 को निर्धारित की है।

इस अंतरिम आदेश से फिलहाल संस्थान को राहत मिली है। हालांकि, सिक्योरिटी डिपॉजिट की मांग की वैधता पर अंतिम फैसला आगे की सुनवाई और प्रतिवादियों के जवाब के बाद होगा।

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