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हाईकोर्ट ने खोला किच्छा और नवगठित सिरौली कलां निकाय चुनाव की मतगणना रास्ता , अब किच्छा और सिरौली कलां को चाहिए विकास का हिसाब!

किच्छा-सिरौली कलां निकाय चुनाव में सियासी टकराव चरम पर, बेहड़-शुक्ला की जंग के बीच सड़क, जलभराव, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे सवाल पीछे।

दर्पण न्यूज 24/7| किच्छा

किच्छा की राजनीति में इस समय दो तस्वीरें एक साथ दिखाई दे रही हैं। एक ओर हाईकोर्ट ने किच्छा और नवगठित सिरौली कलां निकाय चुनाव की मतगणना पर लगी रोक हटाकर चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ किया है, वहीं दूसरी ओर चुनाव के दौरान सामने आए राजनीतिक टकराव ने शहर की सियासत को फिर विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला की प्रतिस्पर्धा के केंद्र में ला खड़ा किया है।

22 सितंबर को मतदान के बाद मतगणना को अग्रिम आदेश तक रोक दिया गया था। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 24 सितंबर को सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के उस निर्णय पर रोक लगाते हुए शीघ्र मतगणना शुरू कराने को कहा। अदालत के रुख से दोनों निकायों के चुनाव परिणाम सामने आने की राह खुली है।

लेकिन किच्छा के लिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसके पक्ष में कितने वोट पड़े? बड़ा सवाल यह भी है कि चुनाव परिणाम आने के बाद शहर की राजनीति किस दिशा में जाएगी और विकास के वे मुद्दे कब राजनीतिक प्राथमिकता बनेंगे, जिनका असर सीधे आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है।

गौरतलब है कि यहां मतदान के बाद मंडी समिति स्थित स्ट्रांग रूम के बाहर पर्दे लगाए जाने को लेकर विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के समर्थक आमने-सामने आ गए थे। विवाद बढ़ा और बेहड़ ने अपने को थप्पड़ मारने का आरोप लगाया। पुलिस ने दोनों पक्षों को अलग किया। बाद में इस मामले में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी की भी खबर सामने आई है। मामले के पूरे घटनाक्रम और संबंधित आरोपों पर जांच की प्रक्रिया अलग विषय है।

पूर्व विधायक राजेश शुक्ला की ओर से भी चुनाव प्रक्रिया और स्ट्रांग रूम से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए, जिनकी पुलिस जांच की बात सामने आई है। ऐसे आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही हो सकेगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि किच्छा की राजनीति में व्यक्तिगत और दलगत टकराव की तीव्रता बढ़ने का असर क्या शहर के विकास एजेंडे पर पड़ रहा है?

हालांकि बेहड़ और शुक्ला के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कोई नई बात नहीं है। दोनों नेताओं के समर्थक अलग-अलग राजनीतिक खेमों का प्रतिनिधित्व करते हैं और चुनावी राजनीति में यह मुकाबला लगातार चर्चा का विषय बना रहता है। हालिया निकाय चुनाव ने इस प्रतिस्पर्धा को फिर सामने ला दिया है।

लेकिन लोकतंत्र में राजनीतिक मुकाबले का अंतिम अर्थ केवल वर्चस्व तय करना नहीं होता। निकाय चुनाव का सीधा संबंध उस व्यवस्था से है जो नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी है।

सड़क चाहिए या सियासी बयान?
जलभराव से राहत चाहिए या आरोप-प्रत्यारोप?
युवाओं को रोजगार चाहिए या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन?
बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए या चुनावी विवाद?

ये सवाल किच्छा की जनता के सामने हैं।

शहर में जलभराव, सड़क, यातायात, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार से जुड़े मुद्दे किसी एक दल या नेता के नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के सवाल हैं। यदि राजनीतिक ऊर्जा लगातार आरोप-प्रत्यारोप और टकराव में खर्च होती रही तो विकास के मुद्दों पर जवाबदेही तय करने का सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा।

हाईकोर्ट का संदेश सिर्फ मतगणना तक सीमित नहीं।

किच्छा और सिरौली कलां के चुनाव को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि में आरक्षण, सीमा विस्तार और निकाय गठन से जुड़े कानूनी सवाल भी रहे हैं। इन्हीं विवादों के बीच चुनाव कराया गया और मतदान के बाद मतगणना रोक दी गई थी। अब हाईकोर्ट के आदेश ने कम से कम तत्काल चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता खोल दिया है।

यानी अब राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के सामने अगली चुनौती परिणाम के बाद शुरू होगी।

जीत किसकी होगी, यह मतपेटियां बताएंगी।
लेकिन किच्छा का विकास किस गति से होगा, इसका जवाब निर्वाचित प्रतिनिधियों और निकाय व्यवस्था को देना होगा।

चुनाव परिणाम चाहे किसी के पक्ष में जाए, किच्छा की जनता की अपेक्षाएं बदलने वाली नहीं हैं। उन्हें बेहतर सड़क चाहिए, जलभराव से राहत चाहिए, सुचारु यातायात चाहिए, रोजगार के अवसर चाहिए, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं चाहिए तथा व्यापारिक गतिविधियों के लिए अनुकूल माहौल चाहिए।

इसीलिए चुनाव के बाद किच्छा की राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल वर्चस्व का नहीं, प्राथमिकताओं का होगा।

क्या बेहड़-शुक्ला की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा आगे भी आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बनी रहेगी या यही प्रतिस्पर्धा विकास के मुद्दों पर स्वस्थ राजनीतिक मुकाबले में बदलेगी?

हाईकोर्ट के मतगणना कार्य जाने के निर्णय ने चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। अब किच्छा की जनता यह देखना चाहेगी कि मतगणना के बाद क्या विकास की राजनीति भी आगे बढ़ती है या फिर शहर एक और सियासी टकराव का अखाड़ा बनकर रह जाता है।

किच्छा को सिर्फ नया अध्यक्ष और पार्षद नहीं चाहिए। उसे ऐसी निकाय व्यवस्था चाहिए जो राजनीतिक खींचतान से ऊपर उठकर शहर की बुनियादी समस्याओं पर काम करे। यही इस चुनाव के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों की वास्तविक अग्निपरीक्षा होगी।

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