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उत्तराखंड की सियासत में बड़ी हलचल! क्या तय समय से पहले बजने वाला है चुनावी बिगुल?

जनगणना, कुंभ और चुनाव… आखिर किस समीकरण पर चल रहा मंथन, बढ़ीं राजनीतिक अटकलें।

दर्पण न्यूज 24/7,नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराए जाने की चर्चाओं ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। हालांकि अभी तक चुनाव आयोग या केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन भाजपा संगठन के भीतर चुनावी तैयारियों में आई तेजी और विपक्षी दलों की बढ़ती सक्रियता ने इन अटकलों को नया बल दे दिया है।

सूत्रों के अनुसार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में अगले वर्ष फरवरी-मार्च में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को नवंबर-दिसंबर 2026 में कराने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। इसके पीछे अगले वर्ष फरवरी में शुरू होने वाली राष्ट्रीय जनगणना के दूसरे चरण को प्रमुख वजह माना जा रहा है। माना जा रहा है कि जनगणना और चुनावी प्रक्रिया एक साथ चलने से प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि भाजपा नेतृत्व ने संबंधित राज्यों की इकाइयों को संगठनात्मक तैयारियां तेज करने और बूथ स्तर तक चुनावी ढांचे को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। वहीं विपक्षी दल भी संभावित जल्द चुनाव की आशंकाओं को लेकर रणनीति बनाने में जुट गए हैं। हाल ही में विपक्षी दलों की बैठकों और नेताओं के बयानों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

उत्तराखंड को मिल सकती है अलग राह?

हालांकि उत्तराखंड को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में जनगणना का कार्य पहले चरण में पूरा होने की संभावना के चलते राज्य को समय पूर्व चुनाव की आवश्यकता से राहत मिल सकती है। इसके बावजूद प्रदेश में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों संभावित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनी राजनीतिक तैयारियां आगे बढ़ा रहे हैं।

कुंभ, जनगणना और चुनाव… क्या यही है पूरा खेल?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2027 में हरिद्वार में प्रस्तावित अर्धकुंभ (कुंभ) मेला भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। यदि विधानसभा चुनाव अपने निर्धारित समय पर होते हैं तो प्रशासन को चुनाव, राष्ट्रीय जनगणना और कुंभ जैसे विशाल आयोजन की तैयारियों को लगभग एक साथ संभालना पड़ सकता है। ऐसे में सरकारी मशीनरी और प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या सरकार और चुनाव आयोग प्रशासनिक सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए चुनावी कार्यक्रम में बदलाव पर विचार कर सकते हैं? हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

मतदाता सूची नहीं बनेगी रोड़ा!

चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि चुनाव समय से पहले कराने का निर्णय लिया जाता है तो मतदाता सूची बड़ी बाधा नहीं बनेगी। पुनरीक्षण प्रक्रिया अंतिम चरण में है और जरूरत पड़ने पर अंतिम मतदाता सूची को निर्धारित समय से पहले जारी किया जा सकता है।

फिलहाल कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बढ़ती राजनीतिक गतिविधियां, संगठनात्मक तैयारियां और प्रशासनिक चुनौतियों को लेकर चल रही चर्चाएं यह संकेत जरूर दे रही हैं कि उत्तराखंड की राजनीति आने वाले महीनों में बड़ा मोड़ ले सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि ये चर्चाएं महज सियासी कयास साबित होती हैं या फिर वास्तव में चुनावी बिगुल तय समय से पहले बजता है।

 

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