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विधायक-सांसद चुनते हैं, प्रधान नहीं!

डाकू सुल्ताना के नाम से दर्ज है गौलापार का सुल्ताननगरी गांव, 250 परिवारों को पंचायत चुनाव में मतदान का अधिकार नहीं

दर्पण न्यूज 24/7 हल्द्वानी।

एक तरफ लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदान का अधिकार है और दूसरी तरफ लालकुआं विधानसभा का एक गांव ऐसा भी है, जहां लोग देश की संसद और विधानसभा के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैं, लेकिन अपने गांव का प्रधान चुनने का अधिकार उनके पास नहीं है। गौलापार का सुल्ताननगरी गांव इसी विडंबना की कहानी कहता है।

करीब 250 परिवारों की आबादी वाला यह गांव ब्रिटिशकाल के चर्चित डाकू सुल्ताना के नाम से पहचान रखता है। सरकारी स्कूल से लेकर शिलापट और ग्रामीणों से जुड़े अभिलेखों में आज भी गांव का नाम सुल्ताननगरी दर्ज है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में गांव की स्थिति ऐसी है कि यहां रहने वाले लोग पंचायत प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया से बाहर हैं।

इतिहास में डाकू सुल्ताना, वर्तमान में लोकतंत्र से दूरी!

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार करीब 1920 के आसपास सुल्ताना डाकू तराई और हल्द्वानी से लगे जंगलों में सक्रिय रहता था। पुलिस से बचने के लिए वह जंगल और पहाड़ी इलाकों में बने ठिकानों में छिपता था। स्थानीय किस्सों में उसे अंग्रेजों के करीबी बड़े जमींदारों को निशाना बनाने और गरीबों की मदद करने वाले व्यक्ति के रूप में भी याद किया जाता है।

बताया जाता है कि 1924 में अंग्रेजी हुकूमत ने उसे गिरफ्तार कर फांसी दे दी। सुल्ताना से जुड़े किस्से अब इतिहास का हिस्सा हैं, लेकिन उसके नाम से जुड़ी पहचान गौलापार के सुल्ताननगरी में आज भी कायम है।

स्थानीय बुजुर्ग नंदलाल और पूरन खत्री बताते हैं कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुल्ताना के यहां आने और जंगल की पहाड़ी में उसके ठिकाने से जुड़े कई किस्से सुने हैं। समय के साथ वह कथित ठिकाना भी खत्म हो गया और उसके अवशेष तक नहीं बचे।

102 साल बाद भी नाम वही, सवाल भी वही!

सुल्ताना की कहानी को एक सदी से अधिक समय गुजर चुका है। गांव की पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन सुल्ताननगरी की पहचान नहीं बदली। गांव के सरकारी स्कूल, शिलापट और अन्य अभिलेखों में आज भी यही नाम दर्ज है।

मगर सवाल सिर्फ नाम का नहीं है। सवाल यह है कि जिस गांव के लोग विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें पंचायत चुनाव में अपने स्थानीय प्रतिनिधि चुनने का अधिकार क्यों नहीं मिला?

वोट देने का अधिकार आधा-अधूरा क्यों?

पूर्व बीडीसी सदस्य अर्जुन बिष्ट के अनुसार सुल्ताननगरी के ग्रामीण लंबे समय से मालिकाना हक की मांग कर रहे हैं। वनभूमि से जुड़े विवाद के कारण मामला अटका हुआ है। गांव के अधिकांश लोग कृषि और दुग्ध कारोबार से जुड़े हैं।

सरकारी अभिलेखों में सुल्ताननगरी पंचायत का हिस्सा नहीं होने के कारण यहां के ग्रामीण प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में मतदान नहीं कर पाते।

यानी चुनाव के समय यही ग्रामीण देश की सरकार और प्रदेश की सरकार चुनने के लिए कतार में खड़े होते हैं, लेकिन अपने गांव की स्थानीय सरकार चुनने की बारी आती है तो उनका मताधिकार जैसे गांव की सीमा पर ही रुक जाता है।

लोकतंत्र की सबसे निचली सीढ़ी पर अटका गांव !

पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य गांव के स्तर पर लोगों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देना है। लेकिन सुल्ताननगरी की स्थिति इस व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।

यहां रहने वाला व्यक्ति विधायक चुन सकता है। सांसद चुन सकता है। सरकार बनाने में अपनी भूमिका निभा सकता है। लेकिन उसके गांव में नाली कहां बने, सड़क की प्राथमिकता क्या हो, स्थानीय विकास की निगरानी कौन करे—इन सवालों पर निर्णय लेने वाले पंचायत प्रतिनिधि के चुनाव में उसका वोट नहीं है।

यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का सवाल है जिसमें नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग हो जाता है।

सुल्ताना की कहानी खत्म हुई, सुल्ताननगरी का सवाल बाकी!

सुल्ताना डाकू का दौर कब का खत्म हो चुका है। जंगल बदल गए, रास्ते बदल गए और पीढ़ियां बदल गईं। मगर सुल्ताननगरी की कहानी में एक सवाल आज भी जिंदा है—

क्या किसी गांव की पहचान उसके नाम से तय होगी या उसके नागरिकों के अधिकारों से?

करीब 250 परिवारों वाला यह गांव आज भी अपने उस अधिकार की प्रतीक्षा कर रहा है, जिसके तहत वह अपने गांव के लिए अपना प्रतिनिधि चुन सके।

 

सुल्ताननगरी की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है—

जिस लोकतंत्र में यहां के लोग देश और प्रदेश की सरकार चुन सकते हैं, उसी लोकतंत्र की स्थानीय चौखट पर उनका वोट पहुंचते-पहुंचते रुक जाता है।

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