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गदरपुर की सियासत में अचानक ब्रेक, आरोपों से ज़्यादा दबाव की चर्चा।
दर्पण न्यूज़ 24/7 विशेष रिपोर्ट
गदरपुर।
तराई की राजनीति में उठा ‘गदर’ अचानक जिस तरह थम गया, उसने सत्ता और संगठन—दोनों खेमों में हलचल बढ़ा दी है। जमीन कब्जाने के आरोपों में घिरे भाजपा विधायक अरविंद पांडेय को लेकर जो सियासी तूफान खड़ा हुआ था, वह ऐन वक्त पर ठहर गया। अब सवाल आरोपों से ज़्यादा इस बात पर टिक गए हैं कि आखिर यह ब्रेक किसके इशारे पर लगा?
भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला और रुद्रपुर के मेयर विकास शर्मा द्वारा पांडेय के खिलाफ खुला मोर्चा खोलने के बाद मामला सड़कों से निकलकर संगठन तक पहुंच चुका था। तीखे बयान, खुली चुनौती और साफ संदेश—अब यह अंदरखाने की खींचतान नहीं, सीधी सियासी जंग थी।
इसी बीच पूर्व मंत्री और डीडीहाट विधायक बिशन सिंह चुफाल का पांडेय के आवास पहुंचना कई संकेत दे गया। इसे कुछ लोग संगठन की पहल मान रहे थे, तो कुछ इसे बढ़ते राजनीतिक नुकसान को थामने की कोशिश बता रहे थे।
लेकिन असली भूचाल तब आया, जब खबर उड़ी कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया सलाहकार व पौड़ी सांसद अनिल बलूनी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक का पांडेय के घर पहुंचने का कार्यक्रम तय है। माना जा रहा था कि यह मुलाकात होती तो तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाती। मगर ऐन वक्त पर यह कार्यक्रम रद्द हो गया—और यहीं से चर्चाओं का नया दौर शुरू हो गया।
राजनीतिक गलियारों में अब कहा जा रहा है कि गदरपुर से उठी सियासी लपटों की आंच दिल्ली तक महसूस की गई। इसी बीच केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का ऋषिकेश में होना भी संयोग नहीं माना जा रहा। कयास लगाए जा रहे हैं कि शीर्ष स्तर से मिले संकेतों के बाद ही इस पूरे मामले पर अचानक ब्रेक लगाया गया, ताकि आग और न भड़के।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या गदरपुर का ‘गदर’ वाकई थम गया है, या यह सिर्फ तूफान से पहले की खामोशी है?
तराई की राजनीति का इतिहास बताता है कि जब मामला जमीन और साख से जुड़ जाए, तो चुप्पी ज्यादा दिन टिकती नहीं। सियासी फिज़ा में भले ही फिलहाल सन्नाटा हो, लेकिन भीतरखाने की हलचल अब भी जारी मानी जा रही है।

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