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सपनों की उम्र में दुष्कर्म का दंश, 15 की उम्र में गोद में नवजात!

14 साल की उम्र में पड़ोसी से दोस्ती, पेट दर्द ने खोला गर्भावस्था का राज, 15 साल की उम्र में मां बनी किशोरी! आरोपी पॉक्सो में गिरफ्तार!

हल्द्वानी।

जिस उम्र में एक बच्ची के हाथों में किताबें, आंखों में सपने और मन में भविष्य की उड़ान होनी चाहिए थी, उस उम्र में एक किशोरी को कथित यौन अपराध की पीड़ा और गर्भावस्था का दर्द झेलना पड़ा। बनभूलपुरा थाना क्षेत्र की इस घटना ने न सिर्फ एक परिवार को झकझोर दिया, बल्कि समाज के सामने भी कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।

पड़ोस में रहने वाले एक युवक ने पहले 14 वर्षीय किशोरी से दोस्ती की। आरोप है कि इसके बाद उसे बहला-फुसलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। परिवार को इसकी भनक तक नहीं लगी। जून में अचानक किशोरी के पेट में तेज दर्द उठा तो परिजन उसे सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच हुई तो सामने आया कि किशोरी गर्भवती है।

पेट दर्द ने खोला वह राज, जिसने परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी!

नाबालिग की गर्भावस्था की जानकारी मिलते ही चिकित्सकों ने संवेदनशीलता के साथ परिजनों को विश्वास में लिया और पुलिस को सूचना दी। इसके बाद पुलिस ने शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट समेत संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

मामला अदालत पहुंचा तो किशोरी की कम उम्र और गर्भावस्था की चिकित्सकीय स्थिति भी गंभीर विषय बनी। चिकित्सकीय निगरानी में उसे हाई-रिस्क गर्भावस्था के तौर पर रखा गया।

15 साल की उम्र में मां बनी किशोरी!

अब 15 वर्ष की उम्र में किशोरी ने एक बच्चे को जन्म दिया है। महिला चिकित्सकों की विशेष निगरानी में उसका सुरक्षित प्रसव कराया गया। अस्पताल के अनुसार फिलहाल जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं।

लेकिन अस्पताल की इस राहत के पीछे एक ऐसा सवाल छिपा है, जिसका जवाब सिर्फ कानून को नहीं, पूरे समाज को तलाशना होगा—एक बच्ची को उस उम्र में यह सब क्यों झेलना पड़ा, जब उसे अपने भविष्य की नींव रखनी थी?

अब डीएनए जांच से जुड़ेगा मुकदमे का अगला अध्याय!

मामले में नवजात का डीएनए परीक्षण भी महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है। पुलिस अदालत से अनुमति लेकर डीएनए सैंपल की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी। अदालत की अनुमति के बाद चिकित्सकों के विशेष पैनल द्वारा सैंपल लेकर जांच के लिए भेजे जाने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

फिलहाल अस्पताल की मेडिकल टीम किशोरी और नवजात की सेहत पर नजर बनाए हुए है।

सवाल सिर्फ एक आरोपी का नहीं… समाज की खामोशी का भी है!

यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि बच्चों और किशोरियों के आसपास होने वाली ऐसी गतिविधियों को लेकर परिवार और समाज कितने सतर्क हैं। दोस्ती, भरोसे और बहला-फुसलाकर किए जाने वाले शोषण के बीच अंतर समझना और बच्चों को सुरक्षित माहौल देना केवल कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है।

एक बच्ची की जिंदगी में घटा यह घटनाक्रम अब अदालत में साक्ष्यों और कानून की कसौटी पर परखा जाएगा। लेकिन समाज के सामने सवाल इससे भी बड़ा है—क्या हम अपने बच्चों को सिर्फ खतरा होने के बाद बचाने की कोशिश करेंगे, या खतरा पैदा होने से पहले उनकी आवाज सुनना भी सीखेंगे?

उत्तराखंड