

अंतरराष्ट्रीय कविता महोत्सव में गूंजेगी उत्तराखंड की आवाज, डॉ. अनिल कार्की करेंगे कुमाउनी-हिंदी में कविता पाठ!
पटियाला में 2 से 4 नवंबर तक जुटेंगे देश-विदेश के नामचीन कवि, अमृता प्रीतम को समर्पित होगा महोत्सव!
हल्द्वानी। उत्तराखंड की साहित्यिक प्रतिभा अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान दर्ज कराने जा रही है। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर और चर्चित कवि-कथाकार डॉ. अनिल कार्की अंतरराष्ट्रीय कविता महोत्सव में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करेंगे। पंजाब के पटियाला स्थित पंजाबी यूनिवर्सिटी में 2 से 4 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाले संगत अंतरराष्ट्रीय कविता महोत्सव में उन्हें आमंत्रित किया गया है। इस मंच पर डॉ. कार्की हिंदी के साथ अपनी मातृभाषा कुमाउनी में भी कविता पाठ करेंगे।
संगत (पटियाला) की ओर से मिले इस आमंत्रण को उत्तराखंड के साहित्यिक जगत और विशेष रूप से कुमाउनी भाषा के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। महोत्सव की इस वर्ष की थीम ‘प्रेम, आक्रोश और प्रतिरोध’ (Love, Rage and Resistance) रखी गई है। यह आयोजन पंजाबी साहित्य की महान कवयित्री अमृता प्रीतम को समर्पित होगा।
देश-विदेश की भाषाओं और संस्कृतियों का साझा मंच
तीन दिवसीय महोत्सव में भारत सहित कनाडा, यूक्रेन, कजाखस्तान और कंबोडिया के कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेम, सामाजिक सरोकारों, संघर्ष और प्रतिरोध के स्वर बुलंद करेंगे। खास बात यह होगी कि आमंत्रित कवि अपनी मूल भाषाओं में कविता पाठ करेंगे और साथ-साथ उनकी कविताओं के पंजाबी अनुवाद भी प्रस्तुत किए जाएंगे।
भारत के विभिन्न राज्यों से आमंत्रित कवियों में केरल की अनीता थंपी, असम के जीवन नारहा, गुजरात के पीयूष ठक्कर, तमिलनाडु की चंद्रा थंगराज, कश्मीर के रफीक मसूदी, झारखंड के अनुज लुगुन और उत्तर प्रदेश के पराग पावन शामिल हैं। उत्तराखंड से डॉ. अनिल कार्की कुमाउनी और हिंदी में अपनी कविताएं प्रस्तुत करेंगे।
वहीं, कनाडा से सुखपाल, असमां सलीम और गुरुदेव चौहान, यूक्रेन से हालिना क्रुक, कजाखस्तान से जोया फालकेवा तथा कंबोडिया से विरिया लिम इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में शिरकत करेंगे। इनके अलावा पंजाब के कई कवि भी महोत्सव का हिस्सा होंगे।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचेगी कुमाउनी की साहित्यिक पहचान
केरल से कश्मीर और असम से गुजरात तक की विविध भाषाई अभिव्यक्तियों के बीच कुमाउनी कविता की उपस्थिति इस आयोजन को उत्तराखंड के लिए खास बनाती है। यह केवल एक कवि की उपलब्धि नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषा, लोकसंस्कृति और पहाड़ की साहित्यिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचाने का अवसर भी है।
डॉ. अनिल कार्की को इस उपलब्धि पर उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शशांक शुक्ला, डॉ. राजेंद्र कैड़ा, प्रो. गिरिजा पांडे, प्रो. राजेंद्र रयाल, जगमोहन रौतेला, ओपी पांडे, जगदीश जोशी, दामोदर जोशी देवांशु और डॉ. दिवा भट्ट सहित अनेक साहित्यकारों एवं शिक्षाविदों ने शुभकामनाएं दी हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की थाती-माटी में पले-बढ़े कवि का अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना प्रदेश के लिए गौरव की बात है। विशेष रूप से कुमाउनी भाषा की कविताओं का वैश्विक साहित्यिक मंच पर प्रस्तुत होना इस भाषा की समृद्ध परंपरा और संभावनाओं को नई पहचान दिलाएगा।
दर्पण न्यूज 24/7 के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है कि पहाड़ की लोकभाषा में रची जा रही कविता अब अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संवाद का हिस्सा बनने जा रही है।
