“अंतिम छोर का व्यक्ति” आखिर रहता कहाँ है? 26 साल से सरकारें उसे ढूंढ रही हैं!
हर सरकार कहती है— विकास अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा… लेकिन वह अंतिम व्यक्ति शायद अब भी इंतजार में खड़ा है।
उत्तराखंड बने लगभग 26 साल हो गए। इतने वर्षों में सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, मंत्री बदले, नारे बदले, योजनाओं के नाम बदले, लेकिन एक चीज़ नहीं बदली “अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति” तक विकास पहुंचाने का वादा।
लगता है वह “अंतिम व्यक्ति” कोई आम इंसान नहीं, बल्कि सरकारों के लिए एक रहस्यमयी किरदार है। हर पांच साल बाद उसकी खोज फिर शुरू हो जाती है। मंत्री आते हैं, मंच सजते हैं, माइक गरजते हैं और घोषणा होती है—”हमारी सरकार अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाएगी।”
सवाल यह है कि 26 साल में वह व्यक्ति मिला क्यों नहीं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि विकास का काफिला हर बार रास्ते में ही वीआईपी स्वागत, शिलान्यास, फीता काटने और फोटो सेशन में इतना व्यस्त हो जाता है कि अंतिम छोर तक पहुंचने से पहले ही लौट आता है?
इस बार भी सेवा पखवाड़े में यही संदेश दिया गया कि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा। सुनकर लगा जैसे विकास अभी-अभी देहरादून से निकला है और जीपीएस बार-बार “री-रूटिंग” बता रहा है।
पहाड़ का ग्रामीण आज भी सड़क के लिए तरसता है, अस्पताल में डॉक्टर ढूंढता है, स्कूल में शिक्षक खोजता है और रोजगार के लिए मैदानों की ओर पलायन करता है। लेकिन सरकारी फाइलों में उसका गांव शायद वर्षों पहले ही “विकसित” घोषित हो चुका होता है।
शिलान्यासों की संख्या देखकर लगता है कि उत्तराखंड में पत्थरों का विकास सबसे तेज हुआ है। हर चुनाव से पहले नए पत्थर लग जाते हैं, लेकिन कई बार सड़कें उन पत्थरों तक भी नहीं पहुंच पातीं।
अब तो लगता है कि “अंतिम छोर का व्यक्ति” भी सोचता होगा “भाई, अगर मैं इतना ही महत्वपूर्ण हूं, तो कोई मुझे बता दे कि मैं आखिर खड़ा कहाँ हूं? हर सरकार मुझे खोजने निकलती है, लेकिन मेरे घर तक कोई पहुंचता ही नहीं!”
जनता भी अब समझदार हो चुकी है। उसे भाषणों से ज्यादा अस्पताल में डॉक्टर, खेत तक सड़क, नल में पानी, स्कूल में शिक्षक और युवाओं के लिए रोजगार चाहिए। क्योंकि विकास का असली प्रमाण भाषण नहीं, बल्कि गांव की बदलती तस्वीर होती है।
हो सकता है अगले चुनाव में फिर वही घोषणा सुनाई दे “इस बार विकास सचमुच अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा।”
और अंतिम व्यक्ति मुस्कुराकर कहे “मैं तो यहीं खड़ा हूं साहब… आप ही हर बार रास्ता बदल लेते हैं!”
