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टायरों में हवा भरते-भरते कमला दीदी ने पहाड़ की बेटियों में भर दिया हौसला !

जिस काम को समाज ने ‘मर्दों का काम’ कहा, उसी को बनाया अपनी पहचान… 20-22 साल से पंचर जोड़ रहीं रामगढ़ की ‘आयरन लेडी’ !

दर्पण न्यूज 24/7 | मुक्तेश्वर

सड़क किनारे एक महिला… हाथों में ग्रीस… सामने खुला हुआ टायर… आसपास पड़े औजार… और चेहरे पर उम्र की थकान नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की चमक।

पहली नजर में यह तस्वीर शायद किसी राहगीर को चौंका दे। लेकिन रामगढ़ के ओढ़ाखान से गुजरने वालों के लिए यह अब रोजमर्रा का दृश्य है।

यह हैं कमला नेगी—कमला दीदी।

करीब 20-22 वर्षों से सड़क किनारे वाहनों के पंचर जोड़ते-जोड़ते उन्होंने सिर्फ टायरों की मरम्मत नहीं की, बल्कि उन सामाजिक धारणाओं को भी चुनौती दी है, जो आज तक कुछ कामों को पुरुषों के हिस्से में बांटती आई हैं।

साइकिल से लेकर स्कूटर, बाइक और कार… ट्रक से लेकर भारी-भरकम जेसीबी तक। वाहन कोई भी हो, टायर की समस्या हो तो कमला दीदी के हाथ अपने औजारों के साथ खुद-ब-खुद काम में जुट जाते हैं।

इसी हुनर ने उन्हें इलाके में एक अलग पहचान दी है। लोग उन्हें प्यार से ‘टायर डॉक्टर’, ‘कमला दीदी’ और ‘पहाड़ की आयरन लेडी’ कहते हैं।

जब समाज ने ताना दिया, कमला ने औजार उठा लिए

कमला दीदी की कहानी किसी सरकारी योजना की सफलता की रिपोर्ट नहीं है। यह उस महिला की कहानी है, जिसने जिंदगी के रास्ते में आई मुश्किलों से समझौता करने के बजाय अपने हाथों को ही अपनी ताकत बना लिया।

शुरुआत में जब उन्होंने पति के साथ पंचर लगाने के काम में हाथ बंटाना शुरू किया तो लोगों के ताने भी सुनने पड़े।

‘महिला होकर पंचर लगाएगी?’

शायद ऐसे सवाल किसी और के कदम रोक देते।

लेकिन कमला दीदी के कदम नहीं रुके।

उन्होंने जवाब बहस से नहीं दिया।

उन्होंने जवाब अपने काम से दिया।

धीरे-धीरे साइकिल का पंचर लगाने से शुरुआत हुई। फिर टायर खोलना सीखा। इसके बाद दोपहिया और चारपहिया वाहनों के टायरों की मरम्मत में हाथ आजमाया और समय के साथ वह काम में इतनी दक्ष होती चली गईं कि आज बड़े वाहनों के टायर भी उनके लिए कोई चुनौती नहीं हैं।

पति को देखकर सीखा, मेहनत से खुद की पहचान बनाई

कमला नेगी बताती हैं कि उनके पति हयात सिंह पहले दिल्ली में पंचर लगाने का काम करते थे। बाद में उन्होंने ओढ़ाखान में सड़क किनारे छोटा सा फड़ लगाकर यह काम शुरू किया।

कमला रोज पति को काम करते देखती थीं।

पहले सिर्फ देखती रहीं…

फिर हाथ बंटाया…

और देखते ही देखते वही काम उनकी अपनी पहचान बन गया।

पति से सीखा हुनर आज उनकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है।

कमला दीदी की कहानी में एक खास बात यह भी है कि उन्होंने अपने हुनर को कभी अपनी उम्र के सामने छोटा नहीं पड़ने दिया।

उम्र बढ़ी, लेकिन हौसला आज भी जवान

55-60 वर्ष से अधिक उम्र में जब शरीर पहले जैसी मेहनत की इजाजत नहीं देता, तब भी कमला दीदी अपने काम में जुटी रहती हैं।

टायर उठाना, खोलना, पंचर तलाशना, मरम्मत करना और फिर उसे वाहन में लगाना—यह ऐसा काम है जिसमें शारीरिक मेहनत कम नहीं होती।

लेकिन कमला दीदी के लिए शायद मेहनत कोई बोझ नहीं।

यही मेहनत उनकी पहचान है।

उनके हाथों पर लगी ग्रीस उनके संघर्ष की कहानी कहती है और सड़क किनारे खड़ी उनकी छोटी सी दुकान यह संदेश देती है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बड़े हौसले की जरूरत होती है।

पर्यटकों के लिए चौंकाने वाला, स्थानीय लोगों के लिए भरोसे का नाम

ओढ़ाखान से गुजरने वाले पर्यटक जब किसी महिला को ट्रक या जेसीबी का टायर ठीक करते देखते हैं तो कई बार ठिठककर उन्हें देखने लगते हैं।

उनके लिए यह दृश्य नया हो सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए कमला दीदी अब भरोसे का नाम हैं।

जिस सड़क पर कभी उन्हें एक महिला के रूप में देखकर लोग हैरान होते थे, उसी सड़क पर आज लोग अपनी गाड़ी का टायर लेकर उनके पास पहुंचते हैं।

वक्त ने सवाल पूछने वालों को जवाब दे दिया।

कमला दीदी सिर्फ पंचर नहीं जोड़तीं, हौसले की मिसाल गढ़ती हैं

महिला सशक्तिकरण पर बड़े-बड़े मंचों से भाषण होते हैं। योजनाएं बनती हैं। नारों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की बातें होती हैं।

लेकिन ओढ़ाखान की सड़क पर बैठी कमला दीदी बिना किसी मंच और बिना किसी नारे के महिला आत्मनिर्भरता की अपनी कहानी लिख रही हैं।

उनकी कहानी उन पहाड़ी बेटियों के लिए भी संदेश है, जो जिंदगी में कुछ अलग करना चाहती हैं, लेकिन समाज की सोच, लोगों की बातें या काम की कठिनाई उनके कदम रोक देती है।

कमला दीदी की जिंदगी जैसे कहती है—

लोग क्या कहेंगे, यह सोचते रहोगे तो रास्ते वहीं रह जाएंगे।

हिम्मत करोगे तो वही रास्ते आपकी पहचान बन जाएंगे।

एक पंचर की दुकान… और उससे कहीं बड़ी कहानी

ओढ़ाखान में सड़क किनारे खड़ी कमला नेगी की दुकान भले ही छोटी हो, लेकिन वहां से निकलने वाली कहानी बहुत बड़ी है।

यह कहानी बताती है कि सम्मान काम के आकार से नहीं, मेहनत के आकार से मिलता है।

यह कहानी बताती है कि महिला होना कमजोरी नहीं, और कठिन काम पुरुषों की जागीर नहीं।

और यह भी कि उम्र चाहे कितनी हो जाए, अगर भीतर आत्मविश्वास जिंदा है तो हाथों में औजार आज भी इतिहास लिख सकते हैं।

कमला दीदी टायर में पंचर जोड़ती हैं…

लेकिन उनकी कहानी समाज की सोच में पड़े उन पंचरों को भी जोड़ने का काम कर रही है, जो आज भी महिलाओं को उनकी क्षमता के हिसाब से नहीं, उनकी पारंपरिक भूमिकाओं के हिसाब से आंकते हैं।

ओढ़ाखान की सड़क किनारे खड़ी यह ‘आयरन लेडी’ इसलिए खास है, क्योंकि उन्होंने किसी से बराबरी मांगकर नहीं, बल्कि अपने हुनर के दम पर अपनी जगह बनाई है।

दर्पण न्यूज 24/7 सलाम करता है ऐसी मेहनतकश महिलाओं को, जो बिना शोर किए समाज में बदलाव की सबसे मजबूत कहानी लिख रही हैं।

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