हल्दूचौड़ बना ‘कंक्रीट का कस्बा’: अनियोजित विकास ने गांव की पहचान मिटाई, सुविधाएँ नदारद।
साभार वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश जोशी
हल्दूचौड़।
कभी उपजाऊ खेतों, सिंचित भूमि और समृद्ध कृषि के लिए पहचाना जाने वाला हल्दूचौड़ आज तेजी से कंक्रीट के कस्बे में बदलता जा रहा है। किसानों की खुशियों की प्रतीक रही लहलहाती फसलें अब मल्टीस्टोरी इमारतों और बेतरतीब कालोनियों के बीच खो चुकी हैं। विकास के नाम पर हो रहे अनियोजित निर्माण ने हल्दूचौड़ की सूरत ऐसी कर दी है कि वह न गांव रहा और न ही शहर की सुविधाओं वाला क्षेत्र बन पाया।
बढ़ती कालोनियां, बदलता भू-स्वरूप
हल्दूचौड़ बाजार से सटे बमेटा बंगर, खोमा क्षेत्र, शिवालिकपुरम, इंद्रा आवास, शिवपुरी और हर्ष विहार में तेजी से बस्तियां बस चुकी हैं। वहीं बमेटा बंगर केशव क्षेत्र में नारायणपुरम कालोनी के आसपास कई क्रशर संचालित हो रहे हैं। दुम्का बंगर–बच्चीधर्मा क्षेत्र में गोपीपुरम सहित कई नई कालोनियां खड़ी हो गई हैं।
उत्तर दिशा में पेशकारपुर की जमीन भी तेजी से कालोनियों की गिरफ्त में आ रही है। जहां कभी खेतों की खुशबू महसूस होती थी, आज वहां उबड़-खाबड़ सड़कें, निर्माण सामग्री के ढेर और चारों तरफ फैला कूड़ा ग्रामीणों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। कूड़ा निस्तारण और जल निकासी की व्यवस्था न होने से स्थिति और बदतर है।
हल्दूचौड़ बाजार भी अव्यवस्था की चपेट में
हल्दूचौड़ बाजार की हालत भी संतोषजनक नहीं। मल्टीस्टोरी भवन, शॉपिंग मॉल, होटल, पीवीआर, अस्पताल और कॉलेज जैसी शहरी सुविधाएं तो मौजूद हैं, लेकिन व्यवस्था शून्य है।
दुकानदारों ने निजी पार्किंग ना बनाकर सड़क पर अतिक्रमण कर रखा है। खरीदारों के वाहन मुख्य सड़क पर खड़े रहते हैं, जिससे आवागमन बाधित होता है।
सरकारी पार्किंग, कूड़ा प्रबंधन और जल निकासी व्यवस्था का अभाव बाजार को अव्यवस्थित बना रहा है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों व लोगों की प्रतिक्रियाएं
“रेरा लागू, लेकिन न पालन; कालोनियां संकट बनेंगी” — डॉ. मोहन सिंह बिष्ट, विधायक
सरकार ने रेरा लागू किया, लेकिन न कालोनाइजर उसे मान रहे और न ही खरीददार। बिना नियम-कायदों के बस रही कालोनियां भविष्य में गंभीर समस्याएं खड़ी करेंगी।
“नीति जरूरी, स्थानीय लोग भी जिम्मेदारी समझें” — रोहित दुम्का, मंडल अध्यक्ष, भाजपा
सुनियोजित विकास के लिए नीति बननी चाहिए। सड़कों पर अतिक्रमण हटाना, पानी की बर्बादी रोकना और पार्किंग की व्यवस्था करना प्राथमिक जिम्मेदारी है।
“संकरा किया जा रहा रास्ता, सरकारी गूल भी बेचे जा रहे” — हरेंद्र असगोला, पूर्व ग्राम प्रधान, बमेटा बंगर केशव
अनियोजित विकास भविष्य में गंभीर संकट साबित होगा। कुछ कालोनाइजर अपने हित में सड़कों को संकरा कर देते हैं और सरकारी सिंचाई गूलों तक को बेच देते हैं। ठोस रोडमैप जरूरी है।
“गूलें गायब, अतिक्रमण बढ़ा, कूड़ा प्रणाली शून्य” — रुक्मणी नेगी, ग्राम प्रधान, दुम्का बंगर बच्चीधर्मा
गांव शहर तो बन गया, लेकिन सुविधाएं नहीं मिलीं। सिंचाई गूलें गायब हैं, सड़कों पर अतिक्रमण है और कूड़ा प्रबंधन नहीं। सुधार के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है।
निष्कर्ष
हल्दूचौड़ का तेजी से बदलता स्वरूप विकास के बजाय अव्यवस्था का बोझ बढ़ा रहा है। यदि नियोजन, कूड़ा प्रबंधन, जल निकासी, सड़क सुधार और अतिक्रमण हटाने पर तत्काल कदम नहीं उठे तो यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में गंभीर संकट झेल सकता है।
