पति, पत्नी… और वो: जब दो जिंदगियों के बीच फंसा एक आदमी खुद ही गुम हो गया।
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो, रानीखेत।
कभी-कभी ज़िंदगी इतनी उलझ जाती है कि सच से भागने का रास्ता इंसान को झूठ, साजिश और खुद की ही बनाई अंधेरी गलियों में ले जाता है। रानीखेत की यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है—जहां एक पति, दो पत्नियों और दो मासूम बच्चों के बीच फंसा एक आदमी खुद को ही “लापता” कर बैठा।
आठ दिसंबर की सुबह शहर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में कार्यरत शिक्षिका के पति मनोज कुमार घर से निकले। कहा—“नैनीताल बैंक का इंटरव्यू है।”
लेकिन वह इंटरव्यू कभी था ही नहीं।
कुछ घंटों बाद खैरना–रानीखेत स्टेट हाईवे पर पन्याली जंगल में उसकी स्कूटी सड़क से नीचे गिरी मिली। वही इलाका, जहां गुलदार की आवाजाही आम मानी जाती है। स्कूटी, जंगल, सन्नाटा—और फिर एक इंसान का अचानक गायब हो जाना।
शक की सुई सीधे गुलदार हमले की ओर घूम गई।
पुलिस, वन विभाग, डॉग स्क्वायड—सब मैदान में उतरे। जंगल छाने गए, कैमरे खंगाले गए, लेकिन न खून मिला, न संघर्ष के निशान। गुलदार की मौजूदगी थी, पर हमला नहीं।
धीरे-धीरे कहानी का दूसरा चेहरा सामने आने लगा।
जांच में खुलासा हुआ कि मनोज नैनीताल पहुंचा ही नहीं था। उसने योजनाबद्ध तरीके से स्कूटी जंगल में गिराई, मोबाइल फोन बंद किया और दोस्तों की कार से दिल्ली निकल गया। मकसद साफ था—सबको लगे कि वह किसी अनहोनी का शिकार हो गया है।
पर सवाल यह था—आखिर क्यों?
सर्विलांस ने जवाब दे दिया।
दिल्ली में ठिकाने बदलते हुए मनोज को आखिरकार दक्षिण दिल्ली के बिजवासन इलाके से पुलिस ने ढूंढ निकाला। पूछताछ में जो सच सामने आया, उसने सबको चौंका दिया।
मनोज पिछले कई वर्षों से दोहरी जिंदगी जी रहा था।
साल 2019 में उसने परिजनों को बिना बताए एक मुस्लिम युवती से प्रेम विवाह किया। कुछ समय बाद परिवार ने अनजान रहते हुए उसका विवाह एक शिक्षिका से करा दिया।
एक घर, एक पत्नी—और फिर दूसरा घर, दूसरी पत्नी।
दोनों से एक-एक बच्चा।
समय के साथ झूठ का बोझ भारी होता चला गया। सवाल बढ़ते गए, तनाव गहराता गया। मनोज ने सच्चाई का सामना करने के बजाय उससे भागने का रास्ता चुना—खुद को ही “गायब” कर देना।
एक ऐसा नाटक, जिसमें वह खुद ही शिकार बन गया।
कोतवाल अशोक धनकड़ के अनुसार, मनोज को सकुशल बरामद कर परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया है। अब आगे का फैसला परिवार आपसी सहमति से करेगा।
लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल मनोज नहीं है।
सवाल उन दो स्त्रियों का है, जिन्होंने भरोसा किया।
उन दो बच्चों का है, जिन्हें अब सच के बोझ के साथ बड़ा होना होगा।
और उस समाज का भी, जहां झूठ को आसान रास्ता समझ लिया जाता है।
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की गुमशुदगी नहीं थी—
यह रिश्तों की जिम्मेदारी से भागने की कहानी थी।
एक ऐसा सच, जो देर से सामने आया, लेकिन कई जिंदगियों को उम्र भर का सवाल दे गया।
