सवालों से असहज होती सत्ता का संकेत।
दर्पण न्यूज 24/7 धर्मेंद्र शर्मा
देहरादून! उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी द्वारा कुछ मीडिया संस्थानों को “टटपूंजिया चैनल” कहे जाने के बाद शुरू हुआ विवाद केवल एक बयान भर नहीं है। यह उस बदलती राजनीतिक मानसिकता की झलक भी है, जिसमें सत्ता आलोचना और सवालों के प्रति लगातार असहज दिखाई दे रही है।
लोकतंत्र में मीडिया का काम सवाल पूछना है और सरकार का दायित्व जवाब देना। ऐसे में यदि पत्रकारों या छोटे मीडिया संस्थानों को उनकी आर्थिक या संस्थागत क्षमता के आधार पर कमतर बताया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। देश के छोटे शहरों और कस्बों में काम करने वाले अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद जनता की आवाज को शासन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।
मसूरी में पत्रकारों के सवालों पर मंत्री की प्रतिक्रिया ने विपक्ष को भी सरकार पर हमला बोलने का मौका दिया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इसे पत्रकारिता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अपमान बताया है।
दरअसल, यह विवाद केवल मीडिया और राजनीति के टकराव का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भाषा और व्यवहार के गिरते स्तर का भी संकेत है। राजनीतिक असहमति और मीडिया की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हो सकती है, लेकिन संवाद की गरिमा बनी रहना उतना ही आवश्यक है।
सत्ता में बैठे लोगों से अपेक्षा केवल निर्णय लेने की नहीं, बल्कि संयमित भाषा और लोकतांत्रिक संस्कारों की भी होती है। क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक ताकत सत्ता की शक्ति से नहीं, बल्कि सवालों को सुनने की उसकी क्षमता से तय होती है।
