मुख्यमंत्री की विधानसभा में स्वास्थ्य व्यवस्था बेदम, तो पहाड़ के दूरस्थ अस्पतालों का क्या हाल होगा?
मशीनें करोड़ों की, लेकिन तकनीशियन नहीं,मरीजों की उम्मीदें टूट रहीं!
दर्पण न्यूज 24×7
प्रमोद बमेटा
देहरादून/चंपावत। यदि प्रदेश के मुखिया के गृह जनपद और विधानसभा क्षेत्र के जिला अस्पताल में एमआरआई जैसी अत्याधुनिक जांच केवल तकनीशियन के अभाव में ठप हो जाए और मरीजों को बिना जांच के लौटना पड़े, तो उत्तराखंड के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
चंपावत जिला चिकित्सालय की यह घटना केवल एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है। करोड़ों रुपये खर्च कर आधुनिक मशीनें खरीद लेना तब तक बेमानी है, जब तक उन्हें संचालित करने के लिए प्रशिक्षित तकनीशियन, रेडियोलॉजिस्ट और विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध न हों।
राज्य के कई पर्वतीय जिलों में पहले से ही विशेषज्ञ डॉक्टरों और टैक्नीशियनों की भारी कमी बनी हुई है। अनेक सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को छोटी-छोटी जांच और उपचार के लिए जिला मुख्यालय या बड़े शहरों की दौड़ लगानी पड़ती है। यदि वहां भी मशीनें स्टाफ के अभाव में बंद मिलें, तो मरीजों के सामने निजी अस्पतालों का महंगा विकल्प ही बचता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक चिकित्सा उपकरण तभी उपयोगी हैं, जब उनके संचालन के लिए पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध हो। अन्यथा करोड़ों रुपये की मशीनें अस्पतालों में शोपीस बनकर रह जाती हैं और उनका लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाता।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री की अपनी विधानसभा में स्वास्थ्य सेवाओं की यह स्थिति सामने आ रही है, तो सीमांत और दुर्गम क्षेत्रों—जहां पहले से ही डॉक्टरों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी बनी रहती है—वहां मरीज किस भरोसे सरकारी अस्पतालों का रुख करें?
प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए केवल नई मशीनों का उद्घाटन ही पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को रिक्त पदों पर तत्काल नियुक्तियां, तकनीकी स्टाफ की उपलब्धता, विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती और अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित करनी होगी। अन्यथा आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे केवल सरकारी विज्ञापनों तक सीमित रह जाएंगे और मरीजों को इलाज के बजाय निराशा ही हाथ लगेगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि मुख्यमंत्री की विधानसभा में मरीज तकनीशियन के अभाव में बिना एमआरआई जांच लौट रहे हैं, तो उत्तराखंड के सुदूर पर्वतीय इलाकों के मरीज आखिर किस उम्मीद के सहारे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा करें?
हाले ए विधानसभा धुरंधर धामी!
अस्पताल में मशीनें, लेकिन व्यवस्था लाचार
एमआरआई मशीन मौजूद, तकनीशियन नहीं,मरीज बिना जांच लौटा!
चंपावत जिला चिकित्सालय में आधुनिक एमआरआई मशीन होने के बावजूद तकनीशियन के अभाव में मरीज की जांच नहीं हो सकी। बाराकोट से तय तिथि पर पहुंचे मरीज को बिना एमआरआई कराए लौटना पड़ा। नाराज मरीज ने अस्पताल में ही अपना पर्चा फाड़ते हुए समय, धन और मानसिक परेशानी पर रोष जताया।
यह घटना बताती है कि केवल महंगी मशीनें उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। जब तक अस्पतालों में प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ, विशेषज्ञ चिकित्सक और प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पाएगा। दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले मरीजों के लिए ऐसी अव्यवस्था गंभीर चिंता का विषय है।
