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दर्पण न्यूज़ 24/7
प्रमोद बमेटा
टिफिन बांटने से एसडीएम बनने तक: ऋषिकेश की बेटी मीनाक्षी भाटिया बनीं संघर्ष और सफलता की मिसाल।

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प्रमोद बमेटा
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की बेटियां आज हर क्षेत्र में अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। इसी कड़ी में ऋषिकेश की मीनाक्षी भाटिया ने उत्तराखंड पीसीएस परीक्षा में सफलता प्राप्त कर एसडीएम पद हासिल किया है। उनकी सफलता केवल एक प्रशासनिक पद तक पहुंचने की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और अटूट संकल्प का प्रेरणादायक उदाहरण है।
मूल रूप से ऋषिकेश के प्रगति विहार क्षेत्र की रहने वाली मीनाक्षी भाटिया ने कठिन परिस्थितियों के बीच अपने सपनों को साकार किया। वर्ष 2003 में महज डेढ़ वर्ष की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया। परिवार आर्थिक संकट से जूझने लगा, लेकिन उनकी माता नीलम भाटिया ने हार नहीं मानी और टिफिन सेवा शुरू कर परिवार को संभाला।
मीनाक्षी और उनकी बड़ी बहन शिल्पा भाटिया ने भी अपनी मां के संघर्ष में पूरा साथ दिया। पढ़ाई के साथ-साथ दोनों बहनें घर-घर और कार्यालयों में टिफिन पहुंचाने का कार्य करती थीं। जीवन की कठिनाइयों से जूझते हुए भी उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
मीनाक्षी शुरू से ही मेधावी छात्रा रहीं। 10वीं और 12वीं में सिटी टॉपर बनने के बाद उन्होंने वर्ष 2020 में श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय, ऋषिकेश परिसर से बीकॉम में गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद उन्होंने बिना किसी कोचिंग के सेल्फ स्टडी, पुस्तकों और टेस्ट सीरीज के माध्यम से तैयारी कर उत्तराखंड पीसीएस परीक्षा में सफलता प्राप्त की।
इस सफलता को और भी विशेष बनाता है कि उनकी बड़ी बहन शिल्पा भाटिया का चयन भी एक वर्ष पूर्व उत्तराखंड पीसीएस के अंतर्गत सांख्यिकी अधिकारी पद पर हुआ था और वर्तमान में वह पौड़ी में सेवाएं दे रही हैं। एक ही परिवार की दो बेटियों का प्रशासनिक सेवा में चयन पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा का विषय बन गया है।
मीनाक्षी ने यूपीएससी साक्षात्कार तक का सफर भी तय किया, हालांकि कुछ अंकों से चयन से चूक गईं। लेकिन उन्होंने निराश होने के बजाय अपनी तैयारी जारी रखी और पहली ही कोशिश में उत्तराखंड पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर एसडीएम बनने का सपना साकार कर लिया।
मीनाक्षी भाटिया की कहानी यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए तो सफलता अवश्य मिलती है। आज वह केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के हजारों युवाओं, विशेषकर बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं।
टिफिन पहुंचाने वाली बेटी का एसडीएम बनना यह साबित करता है कि संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता और सपनों की उड़ान के लिए हौसलों का मजबूत होना जरूरी है।