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आज कंधों पर सजने थे कैप्टन के सितारे, लेकिन तिरंगे में लिपटकर घर लौटा अल्मोड़ा का लाल!

एक दिन पहले मिली शहादत, आज प्रमोशन का था इंतजार!

मां की आंखों में गर्व भी था और अपार दर्द भी!

दर्पण न्यूज 24/7

अल्मोड़ा। आज का दिन लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी और उनके परिवार के लिए खुशियों का सबसे बड़ा दिन होना था। आज उनके कंधों पर कैप्टन के सितारे सजने थे। यूनिट में प्रमोशन की तैयारियां थीं, साथी अधिकारी उत्साहित थे और परिवार गर्व के उस पल का इंतजार कर रहा था, जब उनका बेटा भारतीय सेना में एक नई जिम्मेदारी संभालने जा रहा था। लेकिन नियति ने ऐसा दर्द दिया कि खुशियों का वह दिन हमेशा के लिए एक टीस बन गया।

आज जहां बीरेश्वर के कंधों पर कैप्टन के दो सितारे चमकने थे, वहीं कल उनका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। जम्मू-कश्मीर के राजौरी सेक्टर में सेना के विशेष अभियान के दौरान वीरगति को प्राप्त अल्मोड़ा के इस वीर सपूत की शहादत ने पूरे उत्तराखंड को गमगीन कर दिया है।

परिजनों के अनुसार 8 जून को उनका प्रमोशन होना था। यूनिट के अधिकारियों ने भी परिवार को बताया था कि स्टार सेरेमनी की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। हर कोई उस क्षण का इंतजार कर रहा था, जब लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी कैप्टन बीरेश्वर गोस्वामी बनेंगे। लेकिन उससे एक दिन पहले आई दुखद खबर ने सभी सपनों को चकनाचूर कर दिया।

पिता प्रमोद नाथ गोस्वामी की आंखों में बेटे की उपलब्धियों का गर्व है, लेकिन उसे खो देने का दर्द उससे कहीं अधिक गहरा। वह बताते हैं कि बीरेश्वर ने हमेशा देश को सर्वोपरि माना। सेना की वर्दी पहनना उसका सपना था और उसी सपने को पूरा करते हुए उसने अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए।

रविवार को जब तिरंगे में लिपटा बीरेश्वर का पार्थिव शरीर अल्मोड़ा पहुंचा तो हर आंख नम थी। लेकिन सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया जब मां सरस्वती देवी ने अपने बेटे को अंतिम बार देखा। जिस बेटे के कंधों पर आज कैप्टन के सितारे सजने थे, वह तिरंगे में लिपटा उनके सामने था। मां ने कांपते हाथों से बेटे का चेहरा सहलाया और भर्राई आवाज में कहा— “शाबाश बेटा… शाबाश…”

मां के इन शब्दों में बेटे की शहादत पर गर्व भी था और उसे खो देने का अथाह दर्द भी। वहां मौजूद हजारों लोगों की आंखें उस क्षण छलक उठीं।

आर्मी पब्लिक स्कूल रानीखेत और सैनिक स्कूल घोड़ाखाल से शिक्षा प्राप्त करने वाले बीरेश्वर ने बचपन से ही सेना में अधिकारी बनने का सपना देखा था। वर्ष 2023 में संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में प्रशिक्षण प्राप्त किया और जून 2024 में 5 असम रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त किया। कम समय में ही उन्होंने अपनी कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता से सभी का दिल जीत लिया था।

आज उनकी यूनिट में प्रमोशन का जश्न होना था, लेकिन वहां शोक की लहर है। जिन साथियों को उनके कंधों पर सितारे लगाने थे, उन्होंने उन्हें अंतिम सलामी दी। जिन आंखों में उनके उज्ज्वल भविष्य के सपने थे, वे आज उनकी याद में नम हैं।

किसी ने सच ही कहा है— कुछ लोग उम्र से नहीं, अपने कर्मों से बड़े होते हैं।

लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी ने भले ही केवल 25 वर्ष की उम्र पाई, लेकिन उन्होंने ऐसा जीवन जिया, जिस पर पूरा राष्ट्र गर्व करता है। आज उनके कंधों पर कैप्टन के सितारे नहीं सजे, लेकिन उन्होंने अपने बलिदान से वह सम्मान हासिल कर लिया है, जो किसी भी पद और पदोन्नति से कहीं बड़ा है।

अल्मोड़ा का यह लाल आज भले हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी वीरता, उसका समर्पण और उसकी शहादत हमेशा अमर रहेगी।

शत्-शत् नमन, वीर सपूत।

— दर्पण न्यूज 24/7

उत्तराखंड