सोशल मीडिया की राजनीति पर भाजपा का ब्रेक, 2027 के रण से पहले संगठन ने खींची अनुशासन की लक्ष्मण रेखा!
टिकट की दौड़ में डिजिटल प्रचार पर सख्ती, संगठन बोला—’दावेदारी पोस्टर से नहीं, प्रक्रिया से तय होगी’ !
प्रमोद बमेटा ब्यूरो दर्पण न्यूज 24×7
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन सत्ता के गलियारों में चुनावी सरगर्मियां अभी से तेज हो चुकी हैं। भाजपा के भीतर टिकट की चाह रखने वाले नेताओं ने सोशल मीडिया को अपना सबसे बड़ा चुनावी मंच बना लिया था। कहीं “भावी विधायक” के पोस्टर वायरल हो रहे थे, कहीं वीडियो बनाकर विकास का दावा किया जा रहा था, तो कहीं वर्तमान विधायकों के समानांतर जनसंपर्क अभियान चलाए जा रहे थे। इन गतिविधियों ने संगठन के भीतर ऐसी हलचल पैदा की कि अब भाजपा नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ा है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का ताजा बयान केवल अनुशासन की नसीहत नहीं, बल्कि आगामी चुनावों की रणनीति का स्पष्ट संकेत है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि टिकट की दावेदारी सोशल मीडिया, मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर नहीं, बल्कि पार्टी के तय संगठनात्मक मंच पर ही रखी जाएगी। इतना ही नहीं, इस मर्यादा का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दे दी गई है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश के अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में टिकट के दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। कई नेता फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप के जरिए स्वयं को जनता का सबसे बड़ा प्रतिनिधि साबित करने में जुटे हैं। पोस्टर, बधाई संदेश, जनसंपर्क यात्राएं और वीडियो संदेशों की बाढ़ ने यह संकेत देना शुरू कर दिया था कि चुनावी बिगुल बज चुका है। लेकिन भाजपा नेतृत्व ने साफ कर दिया कि डिजिटल लोकप्रियता और संगठन की स्वीकृति दो अलग-अलग विषय हैं।
दरअसल भाजपा की चिंता केवल सोशल मीडिया नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाली अंदरूनी प्रतिस्पर्धा भी है। जब एक ही विधानसभा क्षेत्र में कई नेता स्वयं को संभावित प्रत्याशी के रूप में प्रचारित करते हैं तो इसका सीधा असर वर्तमान विधायक, स्थानीय संगठन और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ता है। कई बार यह प्रतिस्पर्धा गुटबाजी का रूप ले लेती है और चुनाव से पहले ही पार्टी को नुकसान पहुंचाने लगती है। यही कारण है कि भाजपा ने समय रहते स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी के भीतर महत्वाकांक्षा स्वीकार्य है, लेकिन अनुशासन उससे भी बड़ा है।
इस बार भाजपा ने प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया को भी पहले से अधिक व्यवस्थित और बहुस्तरीय बनाया है। अब कोई भी इच्छुक नेता सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचकर टिकट की उम्मीद नहीं कर सकेगा। विधानसभा स्तर पर आवेदन से शुरू होने वाली प्रक्रिया जिला और राज्य स्तर की स्क्रीनिंग से गुजरते हुए अंततः केंद्रीय संसदीय बोर्ड तक पहुंचेगी। हर स्तर पर संगठन दावेदार की स्वीकार्यता, संगठन के प्रति समर्पण, जनाधार, सक्रियता और सबसे महत्वपूर्ण उसकी जीतने की क्षमता का मूल्यांकन करेगा। यह व्यवस्था स्पष्ट करती है कि टिकट का निर्णय किसी एक व्यक्ति की पसंद नहीं, बल्कि संगठनात्मक सहमति और राजनीतिक गणित के आधार पर होगा।
भाजपा का यह कदम केवल संगठनात्मक अनुशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है। पार्टी 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है। ऐसे में वह किसी भी कीमत पर टिकट की खींचतान को सार्वजनिक विवाद में बदलने देना नहीं चाहती। पार्टी नेतृत्व अच्छी तरह जानता है कि चुनाव जीतने से पहले संगठन को एकजुट रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसलिए टिकट वितरण से पहले ही अनुशासन की रेखा खींच दी गई है।
दिलचस्प यह भी है कि सोशल मीडिया पर दावेदारी का चलन केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस सहित अन्य दलों में भी कई चेहरे डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। हालांकि भाजपा ने सबसे पहले इस प्रवृत्ति पर औपचारिक रोक लगाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। इससे अन्य दलों पर भी अपनी संगठनात्मक व्यवस्था स्पष्ट करने का दबाव बढ़ सकता है।
उत्तराखंड की राजनीति में यह पहला अवसर है जब टिकट मांगने के तरीके पर ही पार्टी ने सार्वजनिक रूप से इतनी स्पष्ट और कड़ी टिप्पणी की है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में केवल जनाधार ही नहीं, बल्कि संगठन के प्रति निष्ठा और अनुशासन भी टिकट की सबसे बड़ी कसौटी बनने वाले हैं।
अब सवाल यह नहीं रह गया है कि कौन सबसे ज्यादा पोस्टर लगा रहा है या किसके वीडियो सबसे अधिक वायरल हो रहे हैं। असली सवाल यह है कि संगठन की कसौटी पर कौन कितना खरा उतरता है। भाजपा ने साफ कर दिया है कि टिकट फेसबुक की टाइमलाइन पर नहीं, संगठन की फाइलों में तय होगा। आने वाले महीनों में यह फैसला उत्तराखंड की राजनीति की दिशा और दलों के भीतर की कार्यशैली—दोनों पर गहरा असर डाल सकता है।
प्रमोद बमेटा
ब्यूरो प्रमुख, दर्पण न्यूज 24×7
