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भीड़ का रिकॉर्ड या संकट की दस्तक? उत्तराखंड में ‘ओवर टूरिज्म’ बना नई चुनौती
जब मेजबान ही परेशान हो जाए, तो ‘अतिथि देवो भवः’ का भाव भी पड़ने लगता है फीका
साभार: प्रयाग पाण्डे वरिष्ठ पत्रकार
नैनीताल। उत्तराखंड में पर्यटन लगातार नए कीर्तिमान गढ़ रहा है। चारधाम यात्रा हो, नैनीताल, मसूरी, ऋषिकेश या औली—हर पर्यटन सीजन में लाखों पर्यटक पहाड़ का रुख कर रहे हैं। सरकार इसे आर्थिक विकास और पर्यटन की सफलता के रूप में पेश कर रही है, लेकिन पहाड़ की हकीकत इन आंकड़ों से कहीं अधिक गंभीर है। सवाल अब यह नहीं रह गया कि कितने पर्यटक आए, बल्कि यह है कि क्या उत्तराखंड उन्हें संभालने के लिए तैयार भी है?
पर्यटन स्थलों पर उमड़ती भीड़ अब स्थानीय लोगों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि परेशानी का कारण बनने लगी है। पहाड़ की संकरी सड़कें वाहनों के दबाव से जाम हो रही हैं। कई स्थानों पर कुछ किलोमीटर का सफर तय करने में घंटों लग रहे हैं। पार्किंग की कमी, पेयजल संकट, कूड़ा प्रबंधन की बदहाल व्यवस्था और सार्वजनिक सुविधाओं पर बढ़ता दबाव साफ संकेत दे रहा है कि पर्यटन का विस्तार तो हुआ, लेकिन उसके अनुरूप व्यवस्थाओं का विकास नहीं हो पाया।
सबसे अधिक असर स्थानीय लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। पर्यटन सीजन में बाजारों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर अस्पताल पहुंचने वाले मरीज तक जाम की मार झेल रहे हैं। जिन लोगों के लिए पर्यटन रोजगार का जरिया होना चाहिए था, वही लोग कई बार अव्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उठाने को मजबूर हैं।
भारतीय संस्कृति ने दुनिया को ‘अतिथि देवो भवः’ का संदेश दिया है। लेकिन इस भावना की भी एक सामाजिक और मानवीय सीमा होती है। जब मेजबान के हिस्से की सड़क, पानी, पार्किंग और बुनियादी सुविधाएं भी भीड़ में गुम होने लगें, तब रिश्तों में तनाव पैदा होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि हाल के वर्षों में कई पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच विवाद, कहासुनी और मारपीट जैसी घटनाएं बढ़ी हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि पर्यटन प्रबंधन की कमजोरी का परिणाम है।
विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि प्रत्येक पर्यटन स्थल की एक वहन क्षमता होती है। यदि उससे अधिक दबाव डाला जाए, तो सबसे पहले पर्यावरण प्रभावित होता है, फिर आधारभूत सुविधाएं चरमराती हैं और अंततः स्थानीय समाज में असंतोष पनपने लगता है। उत्तराखंड के कई लोकप्रिय पर्यटन स्थल आज इसी दौर से गुजरते दिखाई दे रहे हैं।
विडंबना यह है कि पर्यटन की सफलता का पैमाना अब भी केवल पर्यटकों की संख्या बनकर रह गया है। इस बात पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा कि उन पर्यटकों को गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं, और स्थानीय लोगों का जीवन कितना प्रभावित हो रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो उत्तराखंड भी दुनिया के उन पर्यटन स्थलों की सूची में शामिल हो सकता है, जहां ओवर टूरिज्म सबसे बड़ी समस्या बन गया।
समाधान भी स्पष्ट है। पर्यटन स्थलों की वैज्ञानिक वहन क्षमता तय की जाए। उसी के अनुरूप पर्यटकों का प्रबंधन हो। पार्किंग, सड़क, पेयजल, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन जैसी आधारभूत सुविधाओं को मजबूत किया जाए। स्थानीय समुदाय को पर्यटन नीति का केंद्र बनाया जाए, ताकि पर्यटन का लाभ भी उन्हें मिले और वे इस उद्योग के सबसे बड़े साझेदार बनें।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी पूंजी उसकी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और आत्मीय आतिथ्य है। यदि अनियंत्रित भीड़, अव्यवस्थित विकास और कमजोर प्रबंधन ने इन्हीं मूल तत्वों को नुकसान पहुंचा दिया, तो सबसे बड़ा नुकसान पर्यटन उद्योग को ही होगा।
पर्यटन की असली सफलता भीड़ जुटाने में नहीं, बल्कि व्यवस्था संभालने में है। क्योंकि जब मेजबान ही परेशान हो जाए, तब ‘अतिथि देवो भवः’ का भाव भी धीरे-धीरे सवालों के घेरे में आ जाता है।

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