जब मेजबान ही बेबस हो जाए, तो ‘अतिथि देवो भवः’ भी हो जाता है बेबस! अति पर्यटन कहीं उत्तराखंड के पर्यटन उद्योग पर ही न बन जाए संकट!
प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और आत्मीय आतिथ्य है। यदि अनियंत्रित भीड़, अव्यवस्थित विकास और कमजोर प्रबंधन ने इन्हीं मूल तत्वों को नुकसान पहुंचा दिया, तो सबसे बड़ा नुकसान पर्यटन उद्योग को ही होगा।
पर्यटन की असली सफलता भीड़ जुटाने में नहीं, बल्कि व्यवस्था संभालने में है। क्योंकि जब मेजबान ही परेशान हो जाए, तब ‘अतिथि देवो भवः’ का भाव भी धीरे-धीरे सवालों के घेरे में आ जाता है।
उत्तराखंड में रिकॉर्ड पर्यटक संख्या के चलते पहाड़ के दर्द को बयां करती वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पांडे की धारदार कलम!
अति पर्यटन कहीं चौपट न कर दे उत्तराखंड का पर्यटन उद्योग!
प्रयाग पाण्डे
देहरादून। उत्तराखंड का पर्यटन उद्योग इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां रिकॉर्ड पर्यटक संख्या सरकार के लिए उपलब्धि तो है, लेकिन पहाड़ के लिए बढ़ता हुआ संकट भी। पर्यटन स्थलों पर क्षमता से कई गुना अधिक भीड़, घंटों लंबा ट्रैफिक जाम, चरमराती बुनियादी सुविधाएं, बढ़ता प्रदूषण और स्थानीय लोगों में बढ़ती नाराजगी इस बात का संकेत है कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी तो यही अति पर्यटन भविष्य में पर्यटन उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
पहाड़ों की सड़कें अब पर्यटन सीजन में वाहनों के दबाव से जाम का पर्याय बन गई हैं। एक घंटे का सफर कई बार आठ से दस घंटे में पूरा हो रहा है। स्थानीय लोग अस्पताल, स्कूल, बाजार और रोजमर्रा के कामों तक समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। पेयजल, पार्किंग, कूड़ा निस्तारण और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं भीड़ के सामने बौनी साबित हो रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के अधिकांश पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता (Carrying Capacity) से कहीं अधिक पर्यटक पहुंच रहे हैं। इसके बावजूद पर्यटकों की संख्या नियंत्रित करने या पर्यटन को वैज्ञानिक तरीके से संचालित करने की प्रभावी व्यवस्था अभी तक विकसित नहीं हो सकी है। परिणामस्वरूप पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।
भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र ‘अतिथि देवो भवः’ रहा है, लेकिन जब स्थानीय लोगों के हिस्से की सड़क, पानी, बिजली और अन्य सुविधाएं प्रभावित होने लगें तो मेजबान और मेहमान के बीच दूरी बढ़ना स्वाभाविक है। उत्तराखंड के कई पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों और स्थानीय निवासियों के बीच छोटी-छोटी बातों पर विवाद, मारपीट और तनाव की घटनाएं इसी असंतुलित व्यवस्था का परिणाम मानी जा रही हैं।
पर्यटन विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यटन का उद्देश्य केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि टिकाऊ और संतुलित पर्यटन व्यवस्था विकसित करना होना चाहिए। यदि स्थानीय समुदाय को पर्यटन से सीधा आर्थिक लाभ मिले, उनकी सुविधाएं सुरक्षित रहें और पर्यटकों की संख्या स्थल की क्षमता के अनुरूप तय की जाए, तभी पर्यटन उद्योग लंबे समय तक फल-फूल सकता है।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में अंधाधुंध पर्यटन को उपलब्धि मानने के बजाय उसके प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन करना समय की मांग है। बिना योजना के बढ़ती भीड़ न केवल प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही है, बल्कि पर्यटन की मूल पहचान—शांति, प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय संस्कृति—को भी नुकसान पहुंचा रही है।
यदि सरकार ने समय रहते वहन क्षमता के आधार पर पर्यटन प्रबंधन, पार्किंग, सार्वजनिक परिवहन, ठोस कचरा प्रबंधन और स्थानीय सहभागिता पर ठोस नीति नहीं बनाई, तो आज जो भीड़ पर्यटन की ताकत दिखाई दे रही है, वही कल उत्तराखंड के पर्यटन उद्योग की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो सकती है।
साफ है कि पर्यटन तभी तक वरदान है, जब तक वह पहाड़ की क्षमता और स्थानीय समाज के सम्मान के भीतर रहे। अन्यथा अति पर्यटन, पर्यटन उद्योग को ही चौपट कर सकता है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
