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लालकुआं की सियासत में आजकल फिर प्रासंगिक हुआ शेर दा का ‘नेताज्यू’  व्यंग्य !
2027 की आहट के साथ लालकुआं में चुनावी सरगर्मी तेज, जनता पूछ रही—नेताज्यु जनसेवा पहले या कुर्सी?
प्रमोद बमेटा | दर्पण न्यूज 24/7, लालकुआं।
लालकुआं विधानसभा में 2027 के चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। गांव-गांव जनसंपर्क, बैठकों का दौर, सोशल मीडिया पर बढ़ती सक्रियता और टिकट की चर्चाओं के बीच कुमाऊँ के प्रसिद्ध लोक-व्यंग्यकार शेर दा अनपढ़ की चर्चित व्यंग्य रचना “नेताज्यू” बरबस याद आती है। उस रचना में चुनावी मौसम में नेताओं के बदले हुए तेवर, जनता से बढ़ती नजदीकियां और बड़े-बड़े वादों पर व्यंग्य किया गया था। समय बदला है, चेहरे बदले हैं, लेकिन जनता के मन में उठने वाले सवाल आज भी लगभग वही हैं।
लालकुआं विधानसभा में इस समय कई नेता और संभावित दावेदार पूरी सक्रियता के साथ मैदान में दिखाई दे रहे हैं। कहीं जनसंपर्क अभियान चल रहे हैं, कहीं बैठकें हो रही हैं, तो कहीं समर्थकों के जरिए राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच आम मतदाता एक सीधा सवाल पूछ रहा है—जब क्षेत्र की मूलभूत समस्याएं लोगों को परेशान कर रही थीं, तब जनता के लिए आवाज उठाने वाला कौन था?
हल्दूचौड़ का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लंबे समय से बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहा है। कई गांवों में सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे अब भी लोगों की रोजमर्रा की चिंता बने हुए हैं। इन समस्याओं पर कभी-कभार आवाज तो उठी, लेकिन व्यापक और लगातार जनसंघर्ष कम ही दिखाई दिया।
यही वजह है कि अब जनता की नजर केवल चुनावी वादों पर नहीं, बल्कि पिछले वर्षों के काम पर है। वह जानना चाहती है कि जो नेता आज उसके बीच पहुंच रहे हैं, उन्होंने बिना किसी चुनावी माहौल के जनता के लिए कितना समय दिया, कितनी लड़ाई लड़ी और कितने मुद्दों को शासन-प्रशासन के सामने मजबूती से उठाया।
यह सवाल किसी एक व्यक्ति या दल तक सीमित नहीं है। वर्तमान विधायक, सांसद, पूर्व विधायक, जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान और 2027 में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे सभी संभावित दावेदार जनता की इसी कसौटी पर परखे जाएंगे।
राजनीति में सक्रियता लोकतंत्र का हिस्सा है और चुनाव लड़ना हर नागरिक का अधिकार। लेकिन लोकतंत्र का दूसरा पक्ष यह भी है कि जनता अपने प्रतिनिधियों से जवाबदेही की अपेक्षा रखती है। यही कारण है कि इस बार लालकुआं में चर्चा केवल टिकट और दावेदारी की नहीं, बल्कि काम और जनसेवा की भी हो रही है।
क्षेत्र के कई लोगों का मानना है कि अब केवल चुनाव के समय सक्रिय होना पर्याप्त नहीं होगा। जनता उन नेताओं को भी याद रखेगी जिन्होंने बिना किसी पद के भी उसके मुद्दों को उठाया और उन लोगों को भी, जो केवल चुनावी मौसम में दिखाई देते हैं।
शायद यही कारण है कि “नेताज्यू” जैसा व्यंग्य आज भी प्रासंगिक महसूस होता है। वह केवल किसी दौर के नेताओं पर कटाक्ष नहीं था, बल्कि लोकतंत्र में जनता की स्मृति और नेताओं की जवाबदेही का एक स्थायी संदेश भी था।
2027 में विधायक तो एक ही बनेगा, लेकिन जनता की अदालत में हर दावेदार की पेशी होगी। वहां न बड़े-बड़े पोस्टर, न सोशल मीडिया की चमक और न ही भीड़ का शोर निर्णायक होगा। वहां फैसला इस बात पर होगा कि किसने जनता के सुख-दुख में साथ दिया और किसने केवल चुनावी मौसम में दस्तक दी।
आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ा न्यायालय जनता ही होती है, और उसकी अदालत में फैसला भाषणों से नहीं, बल्कि काम से लिखा जाता है।

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