बेतरतीब राजमार्ग ने लील ली एक और युवा जिंदगी: आखिर कब जागेंगे जनप्रतिनिधि और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण?
प्रमोद बमेटा | ब्यूरो, दर्पण न्यूज़ 24/7
लालकुआं की एक होनहार जिंदगी सोमवार को गोरापड़ाव हाईवे की अव्यवस्था की भेंट चढ़ गई। अंतरराष्ट्रीय कराटे कोच उदयवीर सिंह के 16 वर्षीय इकलौते पुत्र सिद्धार्थ की सड़क हादसे में हुई दर्दनाक मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। वहीं उसका मित्र अयान खान जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है।
बताया जा रहा है कि दोनों युवक हल्द्वानी से लालकुआं लौट रहे थे। इसी दौरान गोरापड़ाव क्षेत्र में रॉन्ग साइड से आ रहे एक कैंटर ने उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि बाइक में आग लग गई। सिद्धार्थ को बचाया नहीं जा सका, जबकि अयान गंभीर हालत में निजी अस्पताल में भर्ती है।
लेकिन यह सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं है। यह उन लापरवाहियों का परिणाम है, जिनकी ओर क्षेत्रवासी पिछले कई वर्षों से लगातार इशारा करते आ रहे हैं।
जब से राष्ट्रीय राजमार्ग का फोरलेन निर्माण हुआ है, तीनपानी से गोरापड़ाव तक का हिस्सा दुर्घटनाओं का हॉटस्पॉट बन चुका है। रॉन्ग साइड से दौड़ते भारी वाहन, अधूरे सर्विस रोड, अव्यवस्थित कट, अपर्याप्त संकेतक, कमजोर ट्रैफिक निगरानी और नियमों की खुलेआम अनदेखी ने इस मार्ग को लोगों के लिए जानलेवा बना दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार प्रशासन, पुलिस और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से यातायात व्यवस्था सुधारने की मांग की गई, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला। नतीजा यह हुआ कि एक के बाद एक हादसे होते रहे और हर बार किसी न किसी परिवार का चिराग बुझता रहा।
सबसे बड़ा सवाल जनप्रतिनिधियों से भी है। चुनाव के समय विकास और सुरक्षा के बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता आखिर इस संवेदनशील मुद्दे पर मौन क्यों हैं? जिस सड़क पर लगातार लोगों की जान जा रही है, वहां स्थायी समाधान के लिए अब तक कोई ठोस पहल क्यों नहीं दिखाई दी?
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई फोरलेन सड़क यदि लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है, तो विकास का दावा अधूरा ही माना जाएगा। सड़क केवल चौड़ी होने से सुरक्षित नहीं होती, उसके संचालन और यातायात प्रबंधन की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
आज सिद्धार्थ नहीं रहा। कल किसी और का बेटा, भाई या पिता इस अव्यवस्था का शिकार बन सकता है। सवाल यह है कि आखिर कितनी मौतों के बाद व्यवस्था जागेगी? कब रॉन्ग साइड पर दौड़ते भारी वाहनों पर प्रभावी रोक लगेगी? कब गोरापड़ाव से तीनपानी तक सुरक्षित यातायात व्यवस्था सुनिश्चित होगी?
सिद्धार्थ की मौत केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है। यदि अब भी जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधि नहीं जागे, तो यह हाईवे विकास का नहीं, बल्कि मौत का मार्ग कहलाता रहेगा।
