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क्या लोकतंत्र खतरे में है? विपक्ष का न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना कई सवाल छोड़ गया।

 

दर्पण न्यूज 24/7 | नई दिल्ली

भारतीय लोकतंत्र में शायद ही ऐसा मौका आता है जब देश के प्रमुख विपक्षी दल एकजुट होकर सीधे सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखें और कहें कि “देश का लोकतंत्र खतरे में है।” लेकिन इस बार ऐसा हुआ है। इंडिया गठबंधन के 24 दलों के नेताओं ने संयुक्त रूप से प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को पत्र भेजकर चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

पत्र का सबसे बड़ा मुद्दा है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए लाखों पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की आशंका है। उनका कहना है कि दस्तावेज आधारित सत्यापन गरीबों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और प्रवासी मजदूरों जैसे वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर सीधा प्रहार होगा।

विपक्ष ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि आयोग का रवैया निष्पक्ष रेफरी की बजाय एक पक्ष के प्रति नरम दिखाई देता रहा है। विपक्ष का कहना है कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में भी समान मानदंड लागू नहीं किए गए। यदि संवैधानिक संस्था पर ही भरोसा कमजोर होने लगे तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

पत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चल रही प्रक्रियाओं पर भी सवाल उठाए गए हैं। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ फैसले का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र बनाने की न्यायालय की भावना को बाद के कानून ने कमजोर कर दिया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विपक्ष ने इस पूरे मामले को केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का प्रश्न बताया है। उनका कहना है कि जब संसद, चुनाव आयोग और अन्य संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तब न्यायपालिका ही अंतिम उम्मीद बचती है। यही कारण है कि उन्होंने सीधे प्रधान न्यायाधीश से हस्तक्षेप की अपेक्षा जताई है।

हालांकि लोकतंत्र में किसी भी पक्ष द्वारा लगाए गए आरोप अंतिम सत्य नहीं माने जा सकते। निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि विपक्ष के आरोप निराधार हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज किया जाना चाहिए, और यदि आरोपों में दम है तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निष्पक्ष जांच और आवश्यक सुधार अनिवार्य होंगे।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से नहीं चलता, बल्कि जनता के इस भरोसे से चलता है कि उसका वोट सुरक्षित है, उसकी आवाज सुनी जाएगी और संवैधानिक संस्थाएं किसी भी राजनीतिक प्रभाव से ऊपर रहकर काम करेंगी। आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या देश की चुनावी व्यवस्था पर उठे इन गंभीर सवालों का संतोषजनक जवाब मिलेगा, या फिर लोकतंत्र पर छिड़ी यह बहस आने वाले समय में और गहराएगी?

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