








19 चेहरे, एक ताज… लालकुआं की सियासत में ‘दावेदारों’ का महाकुंभ!
2027 की चौसर पर कौन बनेगा जनता की पहली पसंद, कौन रह जाएगा सिर्फ पोस्टरों का सितारा?
दर्पण न्यूज 24×7 ब्यूरो
प्रमोद बमेटा, लालकुआं
लालकुआं। 2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन लालकुआं की सियासत में चुनावी बादल अभी से गरजने लगे हैं। हर नुक्कड़, हर चाय की दुकान और हर सोशल मीडिया पोस्ट पर एक ही सवाल गूंज रहा है”आखिर ताज किसके सिर सजेगा?”
राजनीति की इस बिसात पर दिलचस्प बात यह है कि दावेदारों की संख्या विधानसभा सीट से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। हर चेहरा खुद को जनता की पहली पसंद बताने में जुटा है, जबकि अंतिम फैसला अभी भी जनता और राजनीतिक दलों की मुहर का इंतजार कर रहा है।
अब तक चर्चा में रहे चेहरों में नवीन दुम्का, डॉ. मोहन सिंह बिष्ट, उमेश शर्मा, शुभम अंडोला, कमलेश चंदोला, दीपेंद्र कोश्यारी, हेमवती नंदन दुर्गापाल और प्रमोद कालोनी, शंकर जोशी, उमेश कबड़वाल, राजेंद्र सिंह खनवाल, बीना जोशी, डॉ. बालम सिंह बिष्ट, संध्या डालाकोटी, आनंदी गड़िया, देवेंद्र सिंह बिष्ट ‘देबू’, पवन कुमार चौहान और कमल मुनि आदि के नाम भी चर्चा के केंद्र में आए हैं।
इधर राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दावेदारी करना आसान है, लेकिन पार्टी का टिकट और जनता का विश्वास हासिल करना सबसे कठिन परीक्षा होती है।
इस बार एक दिलचस्प पहलू भी उभरकर सामने आ रहा है। यदि भाजपा अपने ‘नारी शक्ति वंदन’ के संदेश को संगठनात्मक स्तर पर चुनावी रणनीति में उतारने का फैसला करती है, तो अब तक चर्चा में आई एकमात्र महिला भाजपा दावेदार आनंदी गड़िया का राजनीतिक कद अचानक बढ़ सकता है। यह संभावना पूरी तरह पार्टी की रणनीति पर निर्भर करेगी, लेकिन सियासी गलियारों में इसकी चर्चा शुरू हो चुकी है।
दूसरी ओर कांग्रेस में भी यदि महिला नेतृत्व को प्राथमिकता देने का निर्णय होता है, तो तेज-तर्रार और सक्रिय नेत्री बीना जोशी पर पार्टी भरोसा जता सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व ही करेगा।
फिलहाल लालकुआं की जनता इन दिनों मुस्कुराकर कह रही है
“ताज अभी महल में है,
दावेदार मैदान में हैं।
कुछ पोस्टरों में मुस्कुरा रहे हैं,
कुछ जनता की पहचान में हैं।
टिकट की राह अभी लंबी है,
मंजिल अभी दूर-दराज
राजनीति में वही सिकंदर होगा,
जिसके साथ चलेगा जनविश्वास।”
फिलहाल इतना तय है कि लालकुआं विधानसभा में दावेदारों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन चुनावी इतिहास गवाह है कि अंत में मुकाबला पोस्टरों से नहीं, जनता के भरोसे, संगठन की रणनीति और दलों के अंतिम फैसले से तय होता है।
2027 का ताज किसके सिर सजेगा, इसका फैसला न दावेदार करेंगे, न चर्चाएं… आखिरी फैसला तो करेंगी जनभावनाएं ही ।
