








नैनीताल की गाथा लिखने वाले पत्रकार को देश का सलाम!
डॉ. गिरीश रंजन तिवारी को राजभाषा गौरव सम्मान, उत्तराखंड के पहले पत्रकार को मिला यह प्रतिष्ठित पुरस्कार!
एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि के साथ प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न से सम्मानित, देशभर के 13 लेखक चयनित!
नवी मुंबई। पहाड़ की माटी, नैनीताल के इतिहास और उत्तराखंड की समृद्ध विरासत को शब्दों में पिरोकर राष्ट्रीय पटल तक पहुंचाने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक डॉ. गिरीश रंजन तिवारी ने उत्तराखंड का मान बढ़ाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग की ओर से नवी मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में उन्हें प्रतिष्ठित राजभाषा गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया। खास बात यह है कि इस वर्ष देशभर से विभिन्न श्रेणियों में चयनित 13 लेखकों में डॉ. तिवारी उत्तराखंड से एकमात्र पुरस्कार प्राप्त करने वाले लेखक हैं। वे उत्तराखंड के पहले पत्रकार हैं, जिन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय और बंडी संजय कुमार ने डॉ. तिवारी को पुरस्कार प्रदान किया। उन्हें प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न और एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई। यह सम्मान उनकी चर्चित पुस्तक ‘अतीत से वर्तमान तक : नैनीताल का सफर और गॉथिक राजभवन के निर्माण की अद्भुत गाथा’ के लिए दिया गया।
यह पुस्तक महज नैनीताल के इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य यात्रा को समझने का महत्वपूर्ण प्रयास है, जिसमें नैनीताल एक पहाड़ी कस्बे से विकसित होकर देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले शहर के रूप में उभरा। पुस्तक में गॉथिक शैली में निर्मित राजभवन के इतिहास, निर्माण और वास्तुकला के साथ नैनीताल के सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास को शोधपरक ढंग से सामने रखा गया है।
पत्रकारिता से शोध और शोध से राष्ट्रीय पहचान तक!
डॉ. गिरीश रंजन तिवारी की यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका पत्रकारिता जीवन केवल खबरों और घटनाओं की रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने इतिहास, समाज, भाषा और विरासत से जुड़े विषयों को शोध की दृष्टि से देखा और उन्हें पुस्तक के रूप में संरक्षित किया। यही लेखकीय यात्रा अब उन्हें देश के प्रतिष्ठित राजभाषा सम्मान तक ले गई है।
कुमाऊं विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. तिवारी हिंदी लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं। पत्रकारिता पर उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके दो दर्जन से अधिक शोध पत्र और एक हजार से ज्यादा लेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी को देश ही नहीं, विदेशों में भी पहचान मिली है। अमेरिका, हंगरी और मॉरीशस के भारतीय दूतावासों के साथ ही थाईलैंड और सिंगापुर की प्रतिष्ठित संस्थाओं एवं विश्वविद्यालयों ने भी उन्हें हिंदी लेखन, पत्रकारिता और हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए सम्मानित किया है। उनकी एक पुस्तक का विमोचन मॉरीशस के राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति भवन में किया था।
उन्हें उत्तराखंड रत्न, राज्य सूचना आयोग के आरटीआई अवार्ड, अंतर्राष्ट्रीय भारत सम्मान अचीवर्स अवार्ड समेत अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। ऐसे में राजभाषा गौरव पुरस्कार उनकी लंबी लेखकीय और पत्रकारिता यात्रा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में जुड़ गया है।
उत्तराखंड के लिए गौरव का क्षण!
डॉ. तिवारी को पुरस्कार मिलने की खबर से उत्तराखंड में भी खुशी की लहर है। पुरस्कार की घोषणा के बाद राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेनि.) गुरमीत सिंह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने उन्हें बधाई दी थी। उन्होंने डॉ. तिवारी की उपलब्धि को उत्तराखंड के लिए गौरव का विषय बताते हुए कहा था कि ज्ञान, इतिहास और विरासत को शब्दों में सहेजकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना पूरे प्रदेश के लिए गौरव का क्षण है।
अमित शाह बोले—हिंदी को और समृद्ध बनाना समय की जरूरत!
अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने पुरस्कार विजेताओं को बधाई दी। उन्होंने हिंदी लेखन और हिंदी के प्रचार-प्रसार में लेखकों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। सम्मेलन में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे एवं सुनेत्रा पवार, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय और बंडी संजय कुमार सहित वरिष्ठ अधिकारी एवं गणमान्य लोग मौजूद रहे।
सम्मेलन में ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। अमित शाह ने बताया कि इसमें अब आठ लाख शब्द शामिल हो चुके हैं और विभिन्न भारतीय भाषाओं के 50 हजार से अधिक स्थानीय शब्द भी जोड़े गए हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि वर्ष 2029 तक ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ विश्व का सबसे बड़ा शब्दकोष बन जाएगा।
सम्मेलन में ‘अनुवाद सारथी’ ऐप, भारतीय भाषाओं को समर्पित ‘भाषा कुंज’ डेटा सेंटर समेत हिंदी शब्द संसाधन, टंकण और आशुलिपि प्रशिक्षण से जुड़ी पहल भी शुरू की गईं।
डॉ. गिरीश रंजन तिवारी का सम्मान सिर्फ एक पत्रकार और लेखक का सम्मान नहीं है। यह उस पहाड़ की विरासत का सम्मान भी है, जिसे उन्होंने अपनी कलम से देश के सामने रखा। नैनीताल की ऐतिहासिक गाथा को शब्द देने वाली उनकी पुस्तक अब राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखंड की पहचान का हिस्सा बन चुकी है।
