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आखिर इतने बड़े पैमाने में बेशकीमती खैर की लकड़ी बहेड़ी तक पहुंच कैसे ? जंगलों की रखवाली करने वाला सिस्टम आखिर किस नींद में था!

बड़ी बरामदगी से वन विभाग अपनी पीठ तो थपथपा रहा है, लेकिन असली सवाल यह है कि इतनी बड़ी खेप जंगल से निकलकर गोदाम तक पहुंची कैसे और किसकी मिलीभगत से?

हल्द्वानी। उत्तर प्रदेश के बहेड़ी स्थित एक गोदाम से करीब 25 घनमीटर बहुमूल्य खैर की लकड़ी बरामद होना सिर्फ एक कार्रवाई नहीं, बल्कि वन सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने वाला मामला है। वन विभाग इसे बड़ी सफलता बता रहा है, लेकिन यह बरामदगी अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिनसे विभाग बच नहीं सकता।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि उत्तराखंड के जंगलों से इतनी बड़ी मात्रा में खैर की लकड़ी आखिर कब, कहां और कैसे काटी गई? क्या इतने बड़े पैमाने पर कटान बिना किसी अंदरूनी संरक्षण के संभव था? अगर नहीं, तो फिर निगरानी तंत्र किस काम का था? जंगलों की सुरक्षा के लिए तैनात अमला क्या कर रहा था, जब वन माफिया पेड़ काटकर उन्हें आराम से सीमा पार पहुंचा रहा था?

25 घनमीटर खैर की लकड़ी कोई इक्का-दुक्का तस्करी नहीं, बल्कि संगठित और सुनियोजित नेटवर्क का संकेत है। इतनी बड़ी खेप को जंगल से निकालना, रास्ते में छिपाना, परिवहन करना और फिर गोदाम तक पहुंचाना बिना सिस्टम की कमजोरियों या मिलीभगत के संभव नहीं लगता। यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ तस्करों पर नहीं, बल्कि उस पूरी कार्यप्रणाली पर उठ रहे हैं, जो जंगलों की सुरक्षा का दावा करती है।

वन विभाग ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है, लेकिन क्या यह जांच सिर्फ कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगी? क्या विभाग यह भी बताएगा कि लकड़ी किस वन प्रभाग, किस रेंज और किस बीट से निकली? क्या यह पता लगाया जाएगा कि कटान के समय गश्त कहां थी, चौकसी किस स्तर पर थी और किस अधिकारी-कर्मचारी की जिम्मेदारी बनती थी? अगर निगरानी में चूक हुई है, तो क्या सिर्फ तस्कर ही दोषी होंगे या सिस्टम की जवाबदेही भी तय होगी?

यह मामला वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल खड़ा करता है। अगर जंगलों से इतनी बड़ी मात्रा में खैर की लकड़ी बिना रोक-टोक बाहर निकल सकती है, तो फिर गश्त, चेकिंग, सूचना तंत्र और सीमा निगरानी के दावे कितने मजबूत हैं? क्या विभाग के पास अवैध कटान रोकने की वास्तविक क्षमता है, या कार्रवाई सिर्फ बरामदगी के बाद की औपचारिक दौड़ बनकर रह गई है?

वन अपराधों पर लगाम तभी लगेगी जब सिर्फ लकड़ी बरामद होने की खबरें नहीं, बल्कि कटान से लेकर परिवहन और भंडारण तक की पूरी श्रृंखला का पर्दाफाश होगा। असली कार्रवाई तब मानी जाएगी जब यह साफ हो कि पेड़ कहां कटे, लकड़ी किस रास्ते से निकली, किसने आंख मूंदी और किस स्तर पर सिस्टम फेल हुआ।

 

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