आखिर कौन खा रहा रोडवेज की कमाई? पर्दे के पीछे चल रहा करोड़ों का खेल, 35 करोड़ के घाटे ने खोली पोल
दर्पण न्यूज 24/7 | हल्द्वानी
उत्तराखंड परिवहन निगम की बसें जहां यात्रियों का इंतजार कर रही हैं, वहीं शहर की सड़कों पर दौड़ रही निजी ट्रैवल कंपनियों की बसें निगम के राजस्व को खुलेआम रौंदती नजर आ रही हैं। सवाल यह है कि आखिर किसकी शह पर यह खेल वर्षों से चल रहा है और जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदकर क्यों बैठे हैं?
कुमाऊं मंडल में रोडवेज को पिछले वित्तीय वर्ष में 30 से 35 करोड़ रुपये तक का नुकसान हुआ है। निगम के अधिकारियों का दावा है कि ऑल इंडिया परमिट की आड़ में चल रही निजी बसें शहर के अलग-अलग हिस्सों से सवारियां उठा रही हैं, जिससे रोडवेज की आय लगातार गिरती जा रही है। हैरानी की बात यह है कि इस संबंध में परिवहन आयुक्त से लेकर शासन तक कई बार पत्र भेजे जा चुके हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक सन्नाटा पसरा हुआ है।
सूत्रों के मुताबिक पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के परमिट पर चलने वाली 100 से अधिक निजी बसें रोजाना हल्द्वानी से यात्रियों को लेकर रवाना हो रही हैं। जबकि रोडवेज की बसों में यात्रियों की संख्या लगातार घट रही है।
स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो हल्द्वानी डिपो वर्ष 2024-25 में लाभ में था, वह 2025-26 में करोड़ों रुपये के घाटे में पहुंच गया। यही हाल कुमाऊं के अन्य डिपो का भी बताया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन स्थानों पर निजी ट्रैवल कंपनियों ने अपने बस स्टैंड तक विकसित कर लिए हैं, वहां जमीन का उपयोग किस श्रेणी में है? क्या कृषि भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं? यदि ऐसा है तो राजस्व, परिवहन और राज्य कर विभाग अब तक चुप क्यों हैं?
दिल्ली, जयपुर और पंजाब रूटों पर निजी बस संचालक रोडवेज से कम किराया लेकर यात्रियों को आकर्षित कर रहे हैं। एसी स्लीपर और अन्य सुविधाओं के कारण अधिकांश यात्री निजी बसों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसका सीधा असर निगम की आय पर पड़ रहा है।
कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि निगम की आर्थिक हालत इतनी खराब हो चुकी है कि कर्मचारियों के देयकों और सेवानिवृत्त कर्मियों के भुगतान तक प्रभावित हो रहे हैं। उनका कहना है कि डग्गामार और निजी बसों का अनियंत्रित संचालन निगम को दीमक की तरह खोखला कर रहा है।
उत्तराखंड परिवहन निगम के अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि ऑल इंडिया परमिट के नाम पर चल रही बसों की वजह से निगम को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनका मानना है कि प्रभावी प्रवर्तन और सख्त कार्रवाई के बिना इस व्यवस्था पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार और जिम्मेदार विभाग इस करोड़ों के खेल पर कार्रवाई करेंगे या फिर रोडवेज का राजस्व यूं ही निजी बसों के पहियों तले कुचलता रहेगा?
