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वन विभाग की बड़ी कार्रवाई, 20 लाख की खैर की लकड़ी बरामद
मजबूत तंत्र के बावजूद कैसे कट रही बेशकीमती खैर?
पहले भी SOG की कार्यप्रणाली पर उठ चुके हैं सवाल।
दर्पण न्यूज 24/7ब्यूरो गदरपुर/रुद्रपुर
तराई केंद्रीय वन प्रभाग, रुद्रपुर डिवीजन के अंतर्गत वन विभाग की एसओजी और पीपल पड़ाव रेंज की संयुक्त टीम ने रविवार तड़के बड़ी कार्रवाई करते हुए करीब 20 लाख रुपये कीमत की अवैध खैर की लकड़ी से लदा ट्रक बरामद किया है।
हालांकि कार्रवाई से पहले ही तस्कर मौके से फरार हो गए, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर वन विभाग के तंत्र और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रविवार तड़के लगभग तीन बजे, गदरपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत राधे हरि सीड प्लांट से वन विभाग की टीम ने एक ट्रक बरामद किया, जिसमें करीब 150 कुंटल बेशकीमती खैर की लकड़ी लदी हुई थी।
जानकारी के मुताबिक यह लकड़ी उत्तर प्रदेश ले जाने की तैयारी में थी। बताया जा रहा है कि पीपल पड़ाव रेंज की वन विभाग टीम को मुखबिर से सूचना मिली थी कि अवैध खैर से लदा ट्रक महतोष मोड़ पुलिस चौकी से महज 500 मीटर आगे हाईवे किनारे खड़ा है।
सूचना मिलते ही वन क्षेत्राधिकारी पुरनचंद जोशी और एसओजी प्रभारी कैलाश तिवारी के नेतृत्व में संयुक्त टीम ने मौके पर छापेमारी की।
टीम को आता देख लकड़ी माफिया अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गए, जबकि ट्रक को मौके से जब्त कर लिया गया। ट्रक में भरी खैर की लकड़ी की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 20 लाख रुपये आंकी गई है।
वन विभाग ने इस मामले में सीड प्लांट के मालिक के खिलाफ भी वन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है और फरार तस्करों की तलाश शुरू कर दी गई है।
एसओजी प्रभारी के मुताबिक “लकड़ी माफिया खैर से भरे ट्रक को उत्तर प्रदेश ले जाने की फिराक में थे। पकड़ी गई लकड़ी की कीमत करीब 20 लाख रुपये है। आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।”
पुरनचंद जोशी, वन क्षेत्राधिकारी, पीपल पड़ाव की मानें तो
“सर्दियों में वन माफिया ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं अवैध कटान और तस्करी को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फरार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।”
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब वन विभाग के पास एसओजी, रेंज स्टाफ और मुखबिर तंत्र मौजूद है साथ ही पुलिस चौकी महज 500 मीटर दूर है,तब इतनी भारी मात्रा में खैर की लकड़ी आखिर कब, कैसे और कहां से काटी गई?
सूत्रों की मानें तो पूर्व में भी एसओजी प्रभारी की कार्यप्रणाली पर विभागीय कर्मियों द्वारा सवालिया निशान लगाए जा चुके हैं।
ऐसे में बार-बार हो रही इस तरह की घटनाएं कहीं न कहीं अंदरूनी मिलीभगत या लचर निगरानी की ओर इशारा करती हैं।
अब देखना यह होगा कि वन विभाग की यह कार्रवाई सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाती है,
या फिर वास्तव में बेशकीमती जंगलों को लूटने वाले माफियाओं और उनके संरक्षकों पर सख्त शिकंजा कसा जाता है।
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