








मलबे की आड़ में गहरे गड्ढे! सोयाबीन कॉम्प्लेक्स में उपखनिज के खेल की चर्चाओं ने बढ़ाई हलचल!

ध्वस्तीकरण/समतलीकरण के नाम पर परिसर में खुद रहे गहरे गड्ढों पर उठे सवाल, गुपचुप तरीके से उपखनिज निकाले जाने की चर्चाएं, प्रबंधन ने कहा,काम टेंडर प्रक्रिया के तहत।
दर्पण न्यूज 24/7 हल्दूचौड़। वर्षों से बंद पड़े सोयाबीन एवं वनस्पति कॉम्प्लेक्स के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बीच अब परिसर में हो रही कथित गहरी खुदाई को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। सूत्रों के मुताबिक भवनों को हटाने के साथ कुछ स्थानों पर जमीन की सतह से काफी नीचे तक खुदाई किए जाने और वहां से निकलने वाले उपखनिज को बाहर ले जाए जाने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
मामला इसलिए भी चर्चा में है कि ध्वस्तीकरण का उद्देश्य पुराने भवनों और ढांचों को हटाना है, ऐसे में जमीन की गहराई तक खुदाई किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि मलबे और ध्वस्तीकरण की आड़ में यदि जमीन से उपखनिज निकाला जा रहा है तो उसकी अनुमति, मात्रा और निकासी की प्रक्रिया की जांच जरूरी है।
बताया जा रहा है कि परिसर में कुछ स्थानों पर भवनों की बुनियाद से कहीं अधिक गहराई तक खुदाई की गई है। इसी को लेकर सवाल उठ रहा है कि यह खुदाई केवल ध्वस्तीकरण प्रक्रिया का हिस्सा है या इसके पीछे कोई अन्य गतिविधि भी है। सामने आई तस्वीरों में गहरी खुदाई और मिट्टी-मलबे के ढेर दिखाई देने की बात कही जा रही है, लेकिन तस्वीरों के आधार पर उपखनिज की अवैध निकासी की पुष्टि नहीं की जा सकती।
हालांकि मामले को लेकर प्रबंधन स्तर पर सख्ती और नियमों के अनुरूप कार्य कराने की बात कही जा रही है। इसके बावजूद उक्त कार्य से जुड़े लोगों के द्वारा गुपचुप तरीके से उपखनिज बाहर ले जाए जाने की चर्चाएं उठ रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यदि सब कुछ निर्धारित प्रक्रिया के तहत हो रहा है तो ध्वस्तीकरण से निकलने वाली सामग्री और जमीन से निकाली जा रही मिट्टी अथवा उपखनिज का हिसाब-किताब किस स्तर पर दर्ज किया जा रहा है।
यूसीएफ के प्रबंधक त्रिलोचन पाठक का कहना है कि ध्वस्तीकरण का कार्य विधिवत टेंडर प्रक्रिया के तहत कराया जा रहा है और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी एवं नियमानुसार है। उन्होंने किसी भी तरह की अनियमितता से इनकार किया है।
फिलहाल मामला चर्चाओं और सवालों के घेरे में है। यदि प्रशासन अथवा संबंधित खनन विभाग मौके पर स्थलीय निरीक्षण कर ध्वस्तीकरण के नाम पर की गई खुदाई, निकाली गई सामग्री, उसके परिवहन तथा संबंधित अभिलेखों की जांच करता है तो स्थिति काफी हद तक साफ हो सकती है।
सवाल सीधा है ध्वस्तीकरण के लिए जितनी खुदाई जरूरी थी, क्या उतनी ही हुई या जमीन के भीतर तक पहुंचने की वजह कुछ और थी? यदि प्रक्रिया पूरी तरह नियमसम्मत है तो जांच से स्थिति स्पष्ट होने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
फिलहाल किसी भी अनियमितता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए वास्तविक तस्वीर संबंधित विभाग की जांच और उपलब्ध अभिलेखों की पड़ताल के बाद ही सामने आएगी।
