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देवभूमि में ‘फेसबुक लाइव’ का दंगल!

सुनीता भट्ट–ज्योति अधिकारी विवाद ने खड़े किए बड़े सवाल, क्या सोशल मीडिया की लड़ाई उत्तराखंड की गरिमा पर भारी पड़ रही है?

दर्पण न्यूज 24/7 धर्मेंद्र शर्मा।

हल्द्वानी। सोशल मीडिया पर चर्चित सुनीता भट्ट और ज्योति अधिकारी के बीच चल रही फेसबुक लाइव की जंग अब पुलिस तक पहुंच चुकी है। दोनों पक्ष लगातार एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। वीडियो संदेशों और फेसबुक लाइव की इस श्रृंखला ने पूरे कुमाऊं, खासकर हल्द्वानी में व्यापक चर्चा छेड़ दी है।

ज्योति अधिकारी ने अपने लाइव प्रसारण में एक पूर्व एसडीएम से जुड़े कथित मामले का खुलासा करने का दावा किया है और निष्पक्ष कार्रवाई न होने के आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर, सुनीता भट्ट ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से सुरक्षा और निजता की रक्षा की मांग करते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें और उनके परिवार को सोशल मीडिया के माध्यम से धमकाया जा रहा है। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है और पुलिस की ओर से भी कोई अंतिम आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सामाजिक प्रश्न खड़ा कर दिया है। उत्तराखंड, जिसे देवभूमि और अपनी शालीन संस्कृति के लिए जाना जाता है, वहां व्यक्तिगत विवादों का इस तरह सोशल मीडिया पर सार्वजनिक प्रसारण क्या सही संदेश देता है? क्या फेसबुक लाइव अब संवाद का मंच रह गया है या व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बनता जा रहा है?

सोशल मीडिया लोकतंत्र का एक सशक्त माध्यम है। इसने अनेक जनहित के मुद्दों को उठाया है और आम लोगों की आवाज़ को ताकत दी है। लेकिन जब व्यक्तिगत विवाद लगातार लाइव प्रसारणों, जवाबी वीडियो और सार्वजनिक आरोपों में बदल जाते हैं, तो समाज में भ्रम, कटुता और अनावश्यक तनाव भी पैदा होता है।

समाज के एक वर्ग का मानना है कि यदि किसी के पास किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध ठोस शिकायत या साक्ष्य हैं, तो उन्हें कानून के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जांच और न्याय की जिम्मेदारी पुलिस और न्यायालय की है, न कि सोशल मीडिया की।

सुनीता भट्ट और ज्योति अधिकारी का यह विवाद केवल दो व्यक्तियों का मामला नहीं रह गया है। इसने यह बहस भी छेड़ दी है कि डिजिटल दौर में लोकप्रियता की प्रतिस्पर्धा कहीं सामाजिक मर्यादाओं पर तो भारी नहीं पड़ रही। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उसके साथ संयम, जिम्मेदारी और दूसरों के अधिकारों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।

अब सभी की निगाहें पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर हैं। उम्मीद यही है कि जांच निष्पक्ष होगी, तथ्य सामने आएंगे और यदि किसी स्तर पर कानून का उल्लंघन हुआ है तो उसके अनुसार कार्रवाई होगी। साथ ही यह घटनाक्रम सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले सभी लोगों के लिए भी एक संदेश है कि लोकप्रियता से अधिक महत्वपूर्ण समाज का विश्वास, उत्तराखंड की गरिमा और जिम्मेदार अभिव्यक्ति है।

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