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उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं धड़ाम!

तबादलों की मार, डॉक्टरों का टोटा… अब हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब।

प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में 30 से 60 प्रतिशत तक पद खाली, चारधाम ड्यूटी और तबादलों से चरमराई व्यवस्था, हल्दूचौड़ सीएचसी बना बदहाली की मिसाल।

दर्पण न्यूज 24×7 | प्रमोद बमेटा

देहरादून/हल्दूचौड़।

उत्तराखंड की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सरकार के आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के दावे जमीनी हकीकत के सामने बौने नजर आ रहे हैं। जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) तक डॉक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों, पैरामेडिकल स्टाफ और चिकित्सा संसाधनों की भारी कमी ने पूरे सिस्टम को संकट में डाल दिया है। हाल के बड़े पैमाने पर हुए तबादलों और चारधाम यात्रा में चिकित्सकों की तैनाती ने हालात को और गंभीर बना दिया है।

स्थिति इतनी चिंताजनक हो चुकी है कि प्रदेश के हजारों मरीज समय पर इलाज न मिलने के कारण मजबूरन निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। सबसे अधिक मार ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों की जनता झेल रही है, जहां सरकारी अस्पताल ही उपचार का एकमात्र सहारा हैं।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े स्वयं व्यवस्था की पोल खोलते हैं। अल्मोड़ा जिले में 302 स्वीकृत चिकित्सक पदों के मुकाबले केवल 115 डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 187 पद वर्षों से खाली पड़े हैं। चारधाम यात्रा के दौरान प्रत्येक पखवाड़े डॉक्टरों की ड्यूटी लगाने से पहले से सीमित स्टाफ वाले अस्पताल और अधिक कमजोर हो गए हैं। यही स्थिति कमोबेश प्रदेश के अधिकांश पर्वतीय जिलों में बनी हुई है।

चंपावत जिले का लोहाघाट अस्पताल भी सरकारी दावों की वास्तविकता बयान करता है। उप जिला चिकित्सालय का दर्जा मिलने के बावजूद अस्पताल आज भी सीमित संसाधनों और अपर्याप्त विशेषज्ञ सेवाओं के सहारे चल रहा है। मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पाया है।

नैनीताल जनपद के मालधन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी डॉक्टरों और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर महिलाओं और स्थानीय लोगों को सड़क पर उतरकर आंदोलन करना पड़ा। उनका कहना है कि हजारों की आबादी एक ऐसे अस्पताल पर निर्भर है, जहां न पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही आवश्यक जांच सुविधाएं। गंभीर मरीजों को रामनगर और हल्द्वानी रेफर करना रोजमर्रा की मजबूरी बन चुका है।

हल्दूचौड़ सीएचसी: हाईकोर्ट के आदेश से खुला अस्पताल, लेकिन व्यवस्था आज भी बीमार।

प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक हल्दूचौड़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी है। यह स्वास्थ्य केंद्र हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद क्षेत्रवासियों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, लेकिन शुरुआती दौर से लेकर आज तक यहां व्यवस्थाएं पूरी तरह पटरी पर नहीं आ सकीं।

अस्पताल में वर्षों से विशेषज्ञ चिकित्सकों और आवश्यक संसाधनों का अभाव बना हुआ है। हाल ही में यहां तैनात एकमात्र विशेषज्ञ चिकित्सक एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधीर कन्याल के स्थानांतरण के बाद स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह चरमरा गई हैं। बच्चों सहित सामान्य मरीजों को भी विशेषज्ञ उपचार के लिए हल्द्वानी या अन्य अस्पतालों की दौड़ लगानी पड़ रही है।

क्षेत्र की लाखों आबादी की स्वास्थ्य जरूरतों का केंद्र होने के बावजूद हल्दूचौड़ सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, जांच सुविधाओं का अभाव और संसाधनों की कमी लगातार जनता के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। ऐसे में यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है कि जब हाईकोर्ट के निर्देशों से स्थापित अस्पताल की यह स्थिति है, तो प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों की हालत का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती।

सरकारी अस्पतालों की लगातार बिगड़ती स्थिति पर अब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी गंभीर चिंता जताई है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य सचिव को 12 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है कि बड़े पैमाने पर किए गए डॉक्टरों के तबादलों के बाद रिक्त पदों को भरने और स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु रखने के लिए क्या ठोस कार्ययोजना बनाई गई है।

बिना वैकल्पिक व्यवस्था तबादले, मरीजों पर दोहरी मार

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पहले से डॉक्टरों की कमी झेल रहे अस्पतालों से चिकित्सकों का स्थानांतरण या चारधाम ड्यूटी में भेजना ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं पर सीधा आघात है। वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना तबादले करने का खामियाजा आखिरकार मरीजों को भुगतना पड़ता है।

स्थिति केवल डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। प्रदेश के अनेक सरकारी अस्पतालों में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, पैथोलॉजी, दवाइयों, आधुनिक उपकरणों, विशेषज्ञ चिकित्सकों और प्रशिक्षित स्टाफ की भारी कमी बनी हुई है। करोड़ों रुपये की लागत से बनी अस्पतालों की इमारतें संसाधनों के अभाव में अपेक्षित स्वास्थ्य सेवाएं देने में असफल साबित हो रही हैं।

सरकारी दावों पर उठते सवाल

एक ओर सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार, आधुनिक अस्पताल और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर अल्मोड़ा, लोहाघाट, मालधन और हल्दूचौड़ जैसे उदाहरण यह साबित कर रहे हैं कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था गहरे संकट से गुजर रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार केवल जवाब दाखिल करेगी या वास्तव में रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्तियां, तबादला नीति की समीक्षा और संसाधनों से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों को नई जीवनरेखा देने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी? या फिर उत्तराखंड की जनता इलाज के लिए यूं ही सरकारी अस्पतालों से निराश होकर निजी अस्पतालों की महंगी चौखट पर भटकने को मजबूर रहेगी?

 

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