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रंग, प्रेम और भक्ति का उत्सव : भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ा होली पर्व!
— दर्पण न्यूज 24/7 | ब्यूरोचीफ़ प्रमोद बमेटा
भारत को पर्वों और उत्सवों की भूमि कहा जाता है, जहां हर त्योहार अपने भीतर आध्यात्मिक संदेश, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का भाव समेटे हुए है। इन्हीं पर्वों में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, उल्लास, भाईचारे और भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का जीवंत प्रतीक है।
होली का वास्तविक स्वरूप ब्रजभूमि की पावन धरा से जुड़ा हुआ है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में मनाई जाने वाली होली आज भी भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के अलौकिक प्रेम की स्मृतियों को जीवित करती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बाल स्वरूप श्रीकृष्ण अपने सांवले रंग को लेकर माता यशोदा से प्रश्न करते थे कि राधा रानी उनसे अधिक गोरी क्यों हैं। तब माता ने स्नेहपूर्वक उन्हें राधा के मुख पर रंग लगाने की सलाह दी। यही प्रसंग आगे चलकर रंगों की होली की परंपरा का आधार बना।
ब्रज की गलियों में श्रीकृष्ण अपने सखा-संगियों के साथ गोपियों संग रंग-गुलाल खेलते थे। यह केवल उत्सव नहीं बल्कि प्रेम, समानता और आनंद का संदेश था। आज भी बरसाना की लठमार होली, वृंदावन की फूलों की होली और फाग-रसिया गायन उसी सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं, जहां भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
होली हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में मन के विकारों—अहंकार, द्वेष और भेदभाव—को त्यागकर प्रेम और सद्भाव के रंगों को अपनाया जाए। जिस प्रकार रंग सभी को एक समान बना देते हैं, उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण का संदेश भी मानवता को एक सूत्र में बांधने का है।
आज आधुनिकता के दौर में होली का स्वरूप भले बदल रहा हो, लेकिन इसकी आत्मा आज भी श्रीकृष्ण की प्रेममयी संस्कृति में ही बसती है। आवश्यकता इस बात की है कि हम होली को केवल रंगों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे सामाजिक सौहार्द, पारिवारिक एकता और आध्यात्मिक चेतना के पर्व के रूप में मनाएं।
होली का प्रत्येक रंग हमें प्रेम का संदेश दे, प्रत्येक अबीर-गुलाल जीवन में सकारात्मकता भर दे और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से समाज में सुख, शांति और समरसता का विस्तार हो — यही इस पावन पर्व का वास्तविक उद्देश्य है।
दर्पण न्यूज 24/7 परिवार की ओर से सभी पाठकों को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

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