

हाथियों के रास्ते पर बिछा दी रेल की पटरी, अब अपनी ही धरती पर बेबस होकर मर रहे गजराज!
छतरपुर-हल्दी के बीच ट्रेन की टक्कर से नर हाथी की मौत ने फिर उठाए गंभीर सवाल, आखिर कब तक उजड़ते रहेंगे हाथियों के पारंपरिक गलियारे और कब जागेगा सिस्टम?
दर्पण न्यूज 24/7 बाजपुर।
वह जंगल की पगडंडी पर ही तो चल रहा था… उसी रास्ते पर, जिस पर शायद उसकी कई पीढ़ियां गुजरती आई होंगी। उसे क्या मालूम था कि जिस राह को प्रकृति ने उसके लिए बनाया, वहां अब लोहे की पटरियां बिछ चुकी हैं। जिस रास्ते से उसका परिवार सुरक्षित जंगल के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंचता था, वहां अब तेज रफ्तार ट्रेनें दौड़ती हैं। बीती रात इसी रास्ते पर जिंदगी और मौत के बीच का फासला कुछ पलों का रह गया। छतरपुर-हल्दी रेलखंड पर बाघ एक्सप्रेस की चपेट में आकर एक नर हाथी की दर्दनाक मौत हो गई।
इस हादसे को महज एक रेल दुर्घटना कहकर भुला देना आसान है, लेकिन इसके पीछे छिपी सच्चाई कहीं ज्यादा भयावह है। सवाल यह नहीं कि हाथी रेलवे ट्रैक पर क्यों आया? सवाल यह है कि उसके सदियों पुराने प्राकृतिक रास्ते पर रेलवे ट्रैक किसने और किस व्यवस्था के तहत बिछा दिया? जब हाथियों की आवाजाही के ये रास्ते सरकारी रिकॉर्ड और वैज्ञानिक अध्ययनों में दर्ज हैं, तो फिर उनकी सुरक्षा के इंतजाम जमीन पर क्यों नजर नहीं आते?
एक हाथी की मौत नहीं, पूरे हाथी परिवार के सामने खड़ा संकट
प्रत्यक्ष जानकारी के अनुसार, हाथियों का एक झुंड रेलवे लाइन पार कर रहा था। इसी दौरान तेज रफ्तार बाघ एक्सप्रेस की चपेट में आने से एक नर हाथी की मौके पर ही मौत हो गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि हाथी का एक दांत टूटकर दूर जा गिरा और ट्रेन का इंजन भी क्षतिग्रस्त हो गया। हादसे के कारण करीब डेढ़ घंटे तक रेल यातायात प्रभावित रहा।
लेकिन इस घटना का सबसे मार्मिक पहलू वह हाथी परिवार है, जो अपने एक साथी को हमेशा के लिए खो चुका है। जंगल में हाथी अकेले रहने वाले जीव नहीं हैं। वे परिवार के साथ चलते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा करते हैं और अपने बच्चों को पीढ़ियों से चले आ रहे रास्तों से परिचित कराते हैं। जिस झुंड के साथ यह नर हाथी रेल लाइन पार कर रहा था, उसके लिए यह सिर्फ एक साथी की मौत नहीं, बल्कि उस सुरक्षित प्राकृतिक संसार पर बढ़ते खतरे का संकेत है।
सरकारी रिपोर्ट में दर्ज है हाथियों की आवाजाही, फिर सुरक्षा क्यों नहीं?
भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक लालकुआं-गूलरभोज रेलखंड का लगभग 16 किलोमीटर और लालकुआं-छतरपुर रेलखंड का करीब 8 किलोमीटर हिस्सा हाथियों के प्राकृतिक आवास और आवाजाही वाले क्षेत्र में आता है। इसका अर्थ साफ है कि रेलवे लाइन और हाथियों के पारंपरिक आवागमन के बीच टकराव कोई नई या अनजानी समस्या नहीं है।
हाथियों के लिए जंगल केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि भोजन, पानी और सुरक्षित आवागमन का पूरा संसार है। जब जंगल के बीच सड़कें, रेल लाइनें और दूसरी मानव निर्मित बाधाएं खड़ी होती हैं तो उनके पारंपरिक गलियारे टूटने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि हाथियों को भोजन और पानी की तलाश में या अपने झुंड के साथ आगे बढ़ने के लिए उन्हीं रास्तों से गुजरना पड़ता है, जहां इंसानी गतिविधियां बढ़ चुकी हैं।
विडंबना देखिए, जिस रास्ते को हाथियों ने सदियों में अपनी स्मृति और व्यवहार का हिस्सा बनाया, उसी रास्ते पर अब उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ रही है।
हादसों का इतिहास पुराना, लेकिन सबक अब भी अधूरा
तराई के इस रेलखंड पर हाथियों की मौत का यह पहला मामला नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में हल्दी के पास दो मादा हाथियों की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हुई थी। वर्ष 2018 में भी ऐसी घटनाएं सामने आईं। वर्ष 2021 में एक हथिनी और उसके बच्चे की जान गई। वर्ष 2022 में लालकुआं क्षेत्र में मालगाड़ी की चपेट में हाथी आया और 2023 में भी हाथियों के घायल होने और मौत की घटनाएं दर्ज की गईं।
राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच देशभर में रेल दुर्घटनाओं में 81 हाथियों की मौत हुई।
सरकार ने देशभर के 127 संवेदनशील रेलखंडों का सर्वे कराया और 77 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में 705 संरचनात्मक सुधारों के सुझाव दिए। इसके बावजूद छतरपुर-हल्दी जैसी घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि योजनाओं और प्रस्तावों का लाभ आखिर जंगल में रहने वाले इन बेजुबानों तक कब पहुंचेगा?
जांच होगी, रिपोर्ट बनेगी, लेकिन अगला हाथी कैसे बचेगा?
हर हादसे के बाद वन विभाग और रेलवे की टीमें मौके पर पहुंचती हैं। ट्रेन की गति, लोको पायलट की भूमिका और सुरक्षा मानकों की जांच होती है। रिपोर्ट तैयार होती है और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन इन औपचारिकताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि अगली बार जब कोई हाथियों का झुंड पटरी पार करने निकलेगा, तो उसे बचाने के लिए वहां क्या व्यवस्था होगी?
विशेषज्ञों के सुझावों के अनुरूप हाथियों के पारंपरिक गलियारों का वैज्ञानिक मानचित्रण, पर्याप्त ऊंचाई और चौड़ाई वाले अंडरपास, ओवरपास, संवेदनशील स्थानों पर प्रभावी गति नियंत्रण और वन विभाग तथा रेलवे के बीच तत्काल सूचना साझा करने की व्यवस्था जरूरी है। आधुनिक तकनीक से हाथियों की मौजूदगी का समय रहते पता लगाकर ट्रेन चालकों को सतर्क करने की व्यवस्था भी विकसित की जानी चाहिए।
सिर्फ बोर्ड लगाकर किसी रेलखंड को संवेदनशील घोषित कर देना वन्यजीव सुरक्षा नहीं है। सुरक्षा तब मानी जाएगी, जब हाथियों को बिना जान गंवाए अपने प्राकृतिक रास्तों से गुजरने का अवसर मिलेगा।
विकास की कीमत क्या जंगल के जीवों की जान होगी?
रेलवे विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है। ट्रेनों का संचालन भी जरूरी है और यात्रियों की सुरक्षा भी। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्रकृति के साथ सदियों से सह-अस्तित्व में रह रहे जीवों के रास्ते ही उनसे छीन लिए जाएं।
हाथी को यह नहीं बताया जा सकता कि अब उसका पुराना रास्ता रेलवे ट्रैक बन चुका है। वह न नक्शा पढ़ता है, न रेलवे का समय-सारिणी समझता है। वह अपनी प्राकृतिक जरूरतों और पीढ़ियों से चले आ रहे व्यवहार के अनुसार चलता है। इसलिए उसके रास्ते में आई बाधा को दूर करना हमारी जिम्मेदारी है।
छतरपुर-हल्दी रेलखंड पर मारा गया वह नर हाथी अब कभी जंगल नहीं लौटेगा। उसके झुंड के बाकी सदस्य शायद फिर उसी रास्ते से गुजरेंगे। सवाल है कि क्या अगली बार भी वहां कोई ट्रेन उनका इंतजार कर रही होगी?
हाथी रेलवे पटरी पर नहीं आया था, रेलवे पटरी उसके रास्ते में आई थी। इस एक वाक्य में पूरे हादसे की पीड़ा और हमारी विकास व्यवस्था के सामने खड़ा सबसे बड़ा सवाल छिपा है। अब जरूरत सिर्फ हाथी की मौत की जांच की नहीं, बल्कि उसके रास्ते को सुरक्षित करने की है। क्योंकि जंगल के रास्ते बंद होंगे, तो ऐसे हादसों की खबरें भी बंद नहीं होंगी।
