

अस्पतालों में इलाज की उम्मीद पर सवाल, हाईकोर्ट की सख्ती के बीच अल्मोड़ा में मासूम को नहीं मिला खून!
52 हजार मरीजों को किया गया रेफर, अब 12 साल की बच्ची के मामले ने खोल दी स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत; आखिर कब सुधरेंगे सरकारी अस्पताल?
दर्पण न्यूज 24/7 | ब्यूरो प्रमोद बमेटा
नैनीताल/अल्मोड़ा। पहाड़ में बीमार पड़ना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल सरकारी अस्पतालों में समय पर इलाज मिलना होता जा रहा है। कहीं डॉक्टर नहीं हैं, कहीं जरूरी जांच की सुविधा नहीं, कहीं संसाधनों का अभाव है तो कहीं जिंदगी बचाने के लिए जरूरी खून तक समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहा। ऐसे में सवाल सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का नहीं, बल्कि उन उम्मीदों का है जो एक आम आदमी सरकारी अस्पताल के दरवाजे पर लेकर पहुंचता है।
उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर इन दिनों दो घटनाओं ने फिर सामने ला दी है। एक ओर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है, वहीं दूसरी ओर अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज में 12 वर्षीय बालिका को रक्त उपलब्ध नहीं होने और रात करीब 10 बजे उसे रेफर किए जाने के मामले ने स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
52 हजार मरीज रेफर, फिर भी व्यवस्था सुधारने का इंतजार!
सरकारी अस्पतालों की स्थिति को लेकर हरिद्वार के नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट की ओर से दायर जनहित याचिका में वर्ष 2025-26 के आंकड़े अदालत के सामने रखे गए। इनमें बताया गया कि डॉक्टरों की कमी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों से करीब 52 हजार मरीजों को उच्च चिकित्सा केंद्रों के लिए रेफर करना पड़ा।
डीडीहाट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति का उदाहरण देते हुए बताया गया कि बिजली की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीजों का उपचार तक टॉर्च की रोशनी में करना पड़ा। यह तस्वीर किसी एक अस्पताल की परेशानी नहीं, बल्कि पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों का आईना है।
हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले में याचिका निस्तारित करते हुए स्वास्थ्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता के लंबित प्रत्यावेदन का चार महीने के भीतर निस्तारण किया जाए और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमियों को दूर करने के लिए ठोस निर्णय लिया जाए।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वॉक-इन-इंटरव्यू के माध्यम से डॉक्टरों के रिक्त पद भरने की प्रक्रिया चल रही है और मार्च तक कमी दूर करने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मार्च तक उन मरीजों का क्या होगा, जिन्हें आज डॉक्टर, जांच और उपचार की सुविधा चाहिए?
अल्मोड़ा में मासूम को खून नहीं मिला, रात में करना पड़ा रेफर!
हाईकोर्ट में स्वास्थ्य व्यवस्था पर चिंता के बीच अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज से सामने आया मामला और भी संवेदनशील है। यहां 12 वर्षीय बालिका को उपचार के दौरान रक्त की आवश्यकता पड़ी। परिजनों को ब्लड बैंक से रक्त नहीं मिल सका। जानकारी मिलने पर रेडक्रॉस के पदाधिकारी रक्तदाता लेकर अस्पताल पहुंचे, लेकिन इसके बावजूद रात करीब 10 बजे बालिका को दूसरे अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया।
इस घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब रक्तदाता उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा था, तब बालिका को रेफर करने की नौबत क्यों आई? क्या ब्लड बैंक में आवश्यक रक्त उपलब्ध नहीं था? क्या रक्तदाता के पहुंचने के बाद भी रक्त उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी? अथवा रेफर करने के पीछे कोई दूसरी चिकित्सकीय वजह थी?
इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन एक बच्ची के उपचार से जुड़ा यह घटनाक्रम व्यवस्था की संवेदनशीलता और आपातकालीन तैयारियों पर सवाल जरूर खड़े करता है।
रेडक्रॉस पदाधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को ज्ञापन देकर मामले की निष्पक्ष जांच कराने, ब्लड बैंक की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने और आपातकालीन परिस्थितियों में रक्त उपलब्ध कराने की व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की है। उनका आरोप है कि ब्लड बैंक में रक्त लेने के लिए मरीजों के तीमारदारों से रक्तदाता की व्यवस्था करने को कहा जाता है, जिससे पहले से परेशान परिजनों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।
पहाड़ के मरीजों के लिए रेफर होना भी किसी परीक्षा से कम नहीं!
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां स्वास्थ्य सेवाओं को पहले से ही चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। दूरस्थ गांवों से अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। ऐसे में यदि प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं मिलता और जिला अस्पताल से भी मरीज को हायर सेंटर भेज दिया जाता है तो मरीज और उसके परिजनों के सामने आर्थिक, शारीरिक और मानसिक संकट खड़ा हो जाता है।
कई परिवारों के लिए रेफर का मतलब सिर्फ अस्पताल बदलना नहीं, बल्कि लंबा सफर, एंबुलेंस की व्यवस्था, अतिरिक्त खर्च और अनिश्चितता से जूझना भी है। गंभीर मरीज के लिए समय सबसे कीमती होता है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का खामियाजा आखिरकार आम नागरिक को ही भुगतना पड़ता है।
सरकार के दावों और अस्पतालों की हकीकत के बीच कितना फासला?
प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। डॉक्टरों की नियुक्ति, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण की योजनाएं भी सामने आती हैं। लेकिन जब एक ओर हजारों मरीज रेफर होने के आंकड़े अदालत तक पहुंचते हैं और दूसरी ओर एक मासूम को रक्त उपलब्ध कराने के मामले में सवाल उठते हैं, तो इन दावों की जमीनी पड़ताल जरूरी हो जाती है।
यह सवाल किसी एक अधिकारी या अस्पताल को कठघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही तय करने का है। आखिर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता कब सुनिश्चित होगी? ब्लड बैंकों में पर्याप्त रक्त और आपातकालीन व्यवस्था कब मजबूत होगी? पहाड़ के मरीजों को छोटी-बड़ी हर बीमारी के लिए मैदानी शहरों की दौड़ कब तक लगानी पड़ेगी?
अब केवल आश्वासन नहीं, जमीन पर बदलाव चाहिए।
हाईकोर्ट की सख्ती ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग के सामने अपनी जिम्मेदारी निभाने का स्पष्ट अवसर रखा है। अल्मोड़ा की घटना ने यह भी याद दिलाया है कि अस्पतालों की व्यवस्थाओं में छोटी-सी चूक भी किसी परिवार के लिए जिंदगी भर का दर्द बन सकती है।
सरकारी अस्पताल किसी पर एहसान नहीं करते। वे जनता के अधिकार और सरकार की जिम्मेदारी का हिस्सा हैं। पहाड़ के लोगों को भी वही उपचार, वही सुविधाएं और वही जीवन बचाने का अवसर मिलना चाहिए, जो प्रदेश के बड़े शहरों में उपलब्ध है।
क्योंकि सवाल सिर्फ अस्पतालों की व्यवस्था का नहीं, उन जिंदगियों का है जो इलाज की उम्मीद लेकर सरकारी अस्पताल पहुंचती हैं।
